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जानिए कैसे कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से मिलेगा संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का फल

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र

दुर्गा सप्तशती में वर्णित सिद्ध कुंजिका स्तोत्र एक अत्यंत चमत्कारिक और तीव्र प्रभाव दिखाने वाला स्तोत्र है। जो लोग पूरी दुर्गा सप्तशती का पाठ नहीं कर सकते वे केवल कुंजिका स्तोत्र का पाठ करेंगे तो उससे भी संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का फल मिल जाता है।

कुंजिका स्तोत्र के लाभ

धन लाभ जिन लोगों को सदा धन का अभाव रहता हो। लगातार आर्थिक नुकसान हो रहा हो। बेवजह के कार्यों में धन खर्च हो रहा हो उन्हें कुंजिका स्तोत्र के पाठ से लाभ होता है। धन प्राप्ति के नए मार्ग खुलते हैं। धन संग्रहण बढ़ता है।

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शत्रु मुक्ति

शत्रुओं से छुटकारा पाने और मुकदमों में जीत के लिए यह स्तोत्र किसी चमत्कार की तरह काम करता है। नवरात्रि के बाद भी इसका नियमित पाठ किया जाए तो जीवन में कभी शत्रु बाधा नहीं डालते कोर्ट-कचहरी के मामलों में जीत हासिल होती है।

रोग मुक्ति

दुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ जीवन से रोगों का समूल नाश कर देते हैं। कुंजिका स्तोत्र के पाठ से न केवल गंभीर से गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है, बल्कि रोगों पर होने वाले खर्च से भी मुक्ति मिलती है।

कर्ज मुक्ति

यदि किसी व्यक्ति पर कर्ज चढ़ता जा रहा है। छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है, तो कुंजिका स्तोत्र का नियमित पाठ जल्द कर्ज मुक्ति करवाता है।

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सुखद दांपत्य जीवन

दांपत्य जीवन में सुख-शांति के लिए कुंजिका स्तोत्र का नियमित पाठ किया जाना चाहिए। आकर्षण प्रभाव बढ़ाने के लिए भी इसका पाठ किया जाता है।

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र की महिमा

भगवान शंकर कहते हैं कि, सिद्धकुंजिका स्तोत्र का पाठ करने वाले को देवी कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास और यहां तक कि अर्चन भी आवश्यक नहीं है। केवल कुंजिका के पाठ मात्र से दुर्गा पाठ का फल प्राप्त हो जाता है।

संक्षिप्त मंत्र

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥ (सामान्य रूप से हम इस मंत्र का पाठ करते हैं लेकिन संपूर्ण मंत्र केवल सिद्ध कुंजिका स्तोत्र में है)

संपूर्ण मंत्र यह है

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ऊं ग्लौं हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।

१- संकल्प: सिद्ध कुंजिका पढ़ने से पहले हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लेकर संकल्प करें। मन ही मन देवी मां को अपनी इच्छा कहें।
२- जितने पाठ एक साथ (०१, ०२, ०३, ०५. ०७. ११) कर सकें, उसका संकल्प करें। अनुष्ठान के दौरान माला समान रखें। कभी एक कभी दो कभी तीन न रखें।
3- सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के अनुष्ठान के दौरान जमीन पर शयन करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें।
४- प्रतिदिन अनार का भोग लगाएं।लाल पुष्प देवी भगवती को अर्पितकरें।
५- सिद्ध कुंजिका स्तोत्र में दशों महाविद्या, नौ देवियों की आराधना है।

किस इच्छा के लिए कितने पाठ करने हैं-

०१- विद्या प्राप्ति के लिए
पांच पाठ ( अक्षत लेकर अपने ऊपरसे तीन बार घुमाकर किताबों में रख दें)

२- यश-कीर्ति के लिए
पांच पाठ ( देवी को चढ़ाया हुआ लालपुष्प लेकर सेफ आदि में रख लें)।

३- धन प्राप्ति के लिए
०९ पाठ (सफेद तिल से अग्यारी करें)

४- मुकदमे से मुक्ति के लिए
सात पाठ (पाठ के बाद एक नींबू काट दें। दो ही हिस्से हों ध्यान रखें इन को बाहरअलग-अलग दिशा में फेंक दें)।

५- ऋण मुक्ति के लिए
सात पाठ (जौं की २१ आहुतियां देते हुए अग्यारी करें। जिसको पैसा दे ना हो या जिससे लेना हो, उसका बस ध्यान कर लें)।

६- घर की सुख-शांति के लिए
तीन पाठ ( मीठा पान देवी को अर्पण करें)

७- स्वास्थ्य के लिए
तीन पाठ (देवी को नींबू चढाएं औरफिर उसका प्रयोग कर लें)

०८- शत्रु से रक्षा के लिए
०३,०७ या ११ पाठ (लगातार पाठकरने से मुक्ति मिलेगी)।

९- रोजगार के लिए
०३,०५,०७, और ११ (एच्छिक) (एकसुपारी देवी को चढाकर अपने पासरख लें।)

१०- सर्वबाधा शांति
तीन पाठ लोंग के तीन जोड़े अग्यारीपर चढ़ाएं या देवी जी के आगे तीनजोड़े लोंग के रखकर फिर उठा लें और खाने या चाय में प्रयोग कर लें श्री सिद्धकुंजिकास्तोत्रम् विनियोग

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विनियोग
ॐ अस्य श्री कुन्जिका स्त्रोत्र
मंत्रस्यसदाशिवऋषि:अनुष्टुपूछंदःश्रीत्रिगुणात्मिका देवता ॐ ऐं बीजं ॐ ह्रीं शक्ति:ॐक्लींकीलकं ममसर्वाभीष्टसिध्यर्थेजपेविनयोग: श्री सिद्धकुंजिकास्तोत्रम्

शिव उवाचशृणु देवि प्रवक्ष्यामि
कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्येयेनमन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः भवेत् ॥१॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।न सूक्तं नापि ध्यानं च
न न्यासो न च वार्चनम् ॥२॥
कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्अतिगुह्यतरंदेविदेवानामपि दुर्लभम् ॥३॥गोपनीयं प्रयत्नेन
स्वयोनिरिव पार्वति।मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेणसंसिद्ध्येत्कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥४॥

अथ मन्त्रः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सःज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वलऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै
विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा इति मन्त्रः॥
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥१॥नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै चनिशुम्भासुरघातिन ॥२॥जाग्रतं हि महादेवि
जपं सिद्धं कुरुष्व मे।ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारीप्रतिपालिका ॥३॥क्लींकारी कामरूपिण्यै
बीजरूपे नमोऽस्तु ते।चामुण्डा चण्डघातीच यैकारी वरदायिनी ॥४॥विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिण ॥५॥धां धीं धूं धूर्जटेः
पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देविशां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥६॥हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥७॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षंधिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ॥८॥सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व में ॥
इदंतुकुंजिकास्तोत्रंमंत्रजागर्तिहेतवे ।अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत् ।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥ ईतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्ण।

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