
नई दिल्ली: देश में आमरण अनशन एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार और NEET पेपर लीक मामले में कार्रवाई की मांग को लेकर अनशन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की बिगड़ती तबीयत ने लोगों को वर्ष 2018 की याद दिला दी है, जब प्रसिद्ध पर्यावरणविद् जी.डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) ने गंगा संरक्षण की मांग को लेकर 111 दिनों तक आमरण अनशन किया था और आखिरकार उनकी मृत्यु हो गई थी।

दो दौर, दो मुद्दे, लेकिन संघर्ष का तरीका एक
जी.डी. अग्रवाल और सोनम वांगचुक के आंदोलनों के मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ने अपनी मांगों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से भूख हड़ताल को हथियार बनाया।
- जी.डी. अग्रवाल ने गंगा को अविरल और निर्मल बनाए रखने, नए जलविद्युत परियोजनाओं पर रोक और गंगा संरक्षण के लिए सख्त कानून की मांग करते हुए आमरण अनशन किया था।
- सोनम वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में सुधार, NEET पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने और छात्रों के हितों की रक्षा की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे हैं।
जी.डी. अग्रवाल का अनशन बना था राष्ट्रीय मुद्दा
पूर्व आईआईटी प्रोफेसर और पर्यावरण विशेषज्ञ जी.डी. अग्रवाल ने 2018 में गंगा संरक्षण के लिए अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। करीब 111 दिनों तक चले अनशन के बाद उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई और अंततः उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण और गंगा की स्थिति पर व्यापक बहस छिड़ गई।
सोनम वांगचुक की सेहत पर बढ़ी चिंता
वर्तमान में सोनम वांगचुक का अनशन भी लंबा खिंच चुका है। लगातार उपवास के कारण उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें कमजोर लेकिन स्थिर बताया है। उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
जी.डी. अग्रवाल की अनशन के दौरान हुई मृत्यु के कारण अब कई सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर चिंता जता रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी दोनों आंदोलनों की तुलना की जा रही है। हालांकि दोनों के मुद्दे अलग हैं, लेकिन लंबे अनशन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
सरकार और समाज के सामने बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान होना चाहिए और ऐसे मामलों में समय रहते संवाद स्थापित करना जरूरी है। जी.डी. अग्रवाल का आंदोलन पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बना, जबकि सोनम वांगचुक का आंदोलन शिक्षानई दिल्ली: देश में आमरण अनशन एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार और NEET पेपर लीक मामले में कार्रवाई की मांग को लेकर अनशन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की बिगड़ती तबीयत ने लोगों को वर्ष 2018 की याद दिला दी है, जब प्रसिद्ध पर्यावरणविद् जी.डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) ने गंगा संरक्षण की मांग को लेकर 111 दिनों तक आमरण अनशन किया था और आखिरकार उनकी मृत्यु हो गई थी।
दो दौर, दो मुद्दे, लेकिन संघर्ष का तरीका एक
जी.डी. अग्रवाल और सोनम वांगचुक के आंदोलनों के मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ने अपनी मांगों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से भूख हड़ताल को हथियार बनाया।
- जी.डी. अग्रवाल ने गंगा को अविरल और निर्मल बनाए रखने, नए जलविद्युत परियोजनाओं पर रोक और गंगा संरक्षण के लिए सख्त कानून की मांग करते हुए आमरण अनशन किया था।
- सोनम वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में सुधार, NEET पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने और छात्रों के हितों की रक्षा की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे हैं।
जी.डी. अग्रवाल का अनशन बना था राष्ट्रीय मुद्दा
पूर्व आईआईटी प्रोफेसर और पर्यावरण विशेषज्ञ जी.डी. अग्रवाल ने 2018 में गंगा संरक्षण के लिए अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। करीब 111 दिनों तक चले अनशन के बाद उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई और अंततः उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण और गंगा की स्थिति पर व्यापक बहस छिड़ गई।
सोनम वांगचुक की सेहत पर बढ़ी चिंता
वर्तमान में सोनम वांगचुक का अनशन भी लंबा खिंच चुका है। लगातार उपवास के कारण उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें कमजोर लेकिन स्थिर बताया है। उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
जी.डी. अग्रवाल की अनशन के दौरान हुई मृत्यु के कारण अब कई सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर चिंता जता रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी दोनों आंदोलनों की तुलना की जा रही है। हालांकि दोनों के मुद्दे अलग हैं, लेकिन लंबे अनशन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
सरकार और समाज के सामने बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान होना चाहिए और ऐसे मामलों में समय रहते संवाद स्थापित करना जरूरी है। जी.डी. अग्रवाल का आंदोलन पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बना, जबकि सोनम वांगचुक का आंदोलन शिक्षानई दिल्ली: देश में आमरण अनशन एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार और NEET पेपर लीक मामले में कार्रवाई की मांग को लेकर अनशन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की बिगड़ती तबीयत ने लोगों को वर्ष 2018 की याद दिला दी है, जब प्रसिद्ध पर्यावरणविद् जी.डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) ने गंगा संरक्षण की मांग को लेकर 111 दिनों तक आमरण अनशन किया था और आखिरकार उनकी मृत्यु हो गई थी।
दो दौर, दो मुद्दे, लेकिन संघर्ष का तरीका एक
जी.डी. अग्रवाल और सोनम वांगचुक के आंदोलनों के मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ने अपनी मांगों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से भूख हड़ताल को हथियार बनाया।
- जी.डी. अग्रवाल ने गंगा को अविरल और निर्मल बनाए रखने, नए जलविद्युत परियोजनाओं पर रोक और गंगा संरक्षण के लिए सख्त कानून की मांग करते हुए आमरण अनशन किया था।
- सोनम वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में सुधार, NEET पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने और छात्रों के हितों की रक्षा की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे हैं।
जी.डी. अग्रवाल का अनशन बना था राष्ट्रीय मुद्दा
पूर्व आईआईटी प्रोफेसर और पर्यावरण विशेषज्ञ जी.डी. अग्रवाल ने 2018 में गंगा संरक्षण के लिए अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। करीब 111 दिनों तक चले अनशन के बाद उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई और अंततः उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण और गंगा की स्थिति पर व्यापक बहस छिड़ गई।
सोनम वांगचुक की सेहत पर बढ़ी चिंता
वर्तमान में सोनम वांगचुक का अनशन भी लंबा खिंच चुका है। लगातार उपवास के कारण उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें कमजोर लेकिन स्थिर बताया है। उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
जी.डी. अग्रवाल की अनशन के दौरान हुई मृत्यु के कारण अब कई सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर चिंता जता रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी दोनों आंदोलनों की तुलना की जा रही है। हालांकि दोनों के मुद्दे अलग हैं, लेकिन लंबे अनशन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
सरकार और समाज के सामने बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान होना चाहिए और ऐसे मामलों में समय रहते संवाद स्थापित करना जरूरी है। जी.डी. अग्रवाल का आंदोलन पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बना, जबकि सोनम वांगचुक का आंदोलन शिक्षानई दिल्ली: देश में आमरण अनशन एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार और NEET पेपर लीक मामले में कार्रवाई की मांग को लेकर अनशन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की बिगड़ती तबीयत ने लोगों को वर्ष 2018 की याद दिला दी है, जब प्रसिद्ध पर्यावरणविद् जी.डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) ने गंगा संरक्षण की मांग को लेकर 111 दिनों तक आमरण अनशन किया था और आखिरकार उनकी मृत्यु हो गई थी।
दो दौर, दो मुद्दे, लेकिन संघर्ष का तरीका एक
जी.डी. अग्रवाल और सोनम वांगचुक के आंदोलनों के मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ने अपनी मांगों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से भूख हड़ताल को हथियार बनाया।
- जी.डी. अग्रवाल ने गंगा को अविरल और निर्मल बनाए रखने, नए जलविद्युत परियोजनाओं पर रोक और गंगा संरक्षण के लिए सख्त कानून की मांग करते हुए आमरण अनशन किया था।
- सोनम वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में सुधार, NEET पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने और छात्रों के हितों की रक्षा की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे हैं।
जी.डी. अग्रवाल का अनशन बना था राष्ट्रीय मुद्दा
पूर्व आईआईटी प्रोफेसर और पर्यावरण विशेषज्ञ जी.डी. अग्रवाल ने 2018 में गंगा संरक्षण के लिए अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। करीब 111 दिनों तक चले अनशन के बाद उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई और अंततः उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण और गंगा की स्थिति पर व्यापक बहस छिड़ गई।
सोनम वांगचुक की सेहत पर बढ़ी चिंता
वर्तमान में सोनम वांगचुक का अनशन भी लंबा खिंच चुका है। लगातार उपवास के कारण उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें कमजोर लेकिन स्थिर बताया है। उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
जी.डी. अग्रवाल की अनशन के दौरान हुई मृत्यु के कारण अब कई सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर चिंता जता रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी दोनों आंदोलनों की तुलना की जा रही है। हालांकि दोनों के मुद्दे अलग हैं, लेकिन लंबे अनशन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
सरकार और समाज के सामने बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान होना चाहिए और ऐसे मामलों में समय रहते संवाद स्थापित करना जरूरी है। जी.डी. अग्रवाल का आंदोलन पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बना, जबकि सोनम वांगचुक का आंदोलन शिक्षा व्यवस्था और छात्रों के भविष्य से जुड़े सवाल उठा रहा है। दोनों घटनाएं यह संदेश देती हैं कि जब संवाद की संभावनाएं कम होती हैं, तब कई लोग अपनी मांगों के लिए आमरण अनशन का रास्ता चुनते हैं।




