पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच एक बड़ी कूटनीतिक प्रगति सामने आई है। दोनों देशों के वार्ताकारों ने मौजूदा संघर्षविराम को 60 दिनों तक बढ़ाने के लिए एक प्रारंभिक समझौते (MoU) पर सहमति बना ली है। हालांकि इस समझौते पर अंतिम मुहर अभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के बाद ही लगेगी।

सूत्रों के मुताबिक, यह समझौता केवल युद्धविराम बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे अहम मुद्दों पर भी बातचीत शुरू करने की योजना बनाई गई है।
तीन महीने से जारी तनाव के बीच अहम कदम
अमेरिका और ईरान के बीच बीते कई महीनों से तनावपूर्ण हालात बने हुए हैं। दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष वार्ताएं ओमान, पाकिस्तान और अन्य मध्यस्थ देशों की मदद से जारी थीं। अप्रैल 2026 में शुरू हुआ अस्थायी संघर्षविराम कई बार टूटने की कगार पर पहुंचा, लेकिन दोनों पक्षों ने पूर्ण युद्ध से बचने की कोशिश जारी रखी।
अब जो नया 60-दिवसीय प्रस्ताव सामने आया है, उसे अब तक की सबसे महत्वपूर्ण प्रगति माना जा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस अवधि में दोनों पक्ष परमाणु गतिविधियों पर नियंत्रण, प्रतिबंधों में संभावित राहत और समुद्री मार्गों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर औपचारिक वार्ता करेंगे।
ट्रंप की मंजूरी पर टिकी निगाहें
हालांकि अमेरिकी और ईरानी वार्ताकार समझौते के मसौदे पर सहमत हो चुके हैं, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी तक अंतिम मंजूरी नहीं दी है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा कि “बातचीत में काफी प्रगति हुई है, लेकिन अभी यह तय नहीं है कि राष्ट्रपति ट्रंप कब और क्या इस समझौते को मंजूरी देंगे।”
व्हाइट हाउस के अंदर भी इस समझौते को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता और सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान पर दबाव बनाए रखना जरूरी है। उनका कहना है कि बहुत जल्दी प्रतिबंधों में राहत देना अमेरिका की रणनीतिक बढ़त को कमजोर कर सकता है।
परमाणु कार्यक्रम होगा मुख्य मुद्दा
सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा हुआ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान उच्च स्तर के यूरेनियम संवर्धन को सीमित करे और अपने अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार को खत्म करे। इसके बदले अमेरिका कुछ आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने पर विचार कर सकता है।
ईरान लंबे समय से यह कहता आया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु हथियार विकसित नहीं कर रहा। हालांकि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को आशंका है कि तेहरान भविष्य में परमाणु हथियार क्षमता हासिल कर सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर भी चर्चा
इस समझौते में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का मुद्दा भी बेहद अहम माना जा रहा है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में शामिल इस जलमार्ग में तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार प्रभावित हुआ था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान जहाजों की आवाजाही सामान्य करने और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने पर सहमत हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह खुलता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आ सकती है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी राहत मिलेगी।
संघर्षविराम के बीच भी बढ़ा तनाव
हालांकि वार्ता आगे बढ़ रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। हाल के दिनों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर कई घटनाएं सामने आईं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि कुवैत की ओर दागी गई मिसाइलों को इंटरसेप्ट किया गया। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे संघर्षविराम का उल्लंघन बताया।
इसके अलावा अमेरिका ने ईरान पर कुछ नए प्रतिबंध भी लगाए हैं, जिससे यह साफ है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास अभी भी बना हुआ है।
मध्यस्थ देशों की भूमिका अहम
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान, ओमान और कुछ खाड़ी देशों की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण रही है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में पहले भी अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के दौर हुए थे। रिपोर्ट्स के अनुसार, कई मसलों पर बैक-चैनल डिप्लोमेसी के जरिए सहमति बनाई गई।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह समझौता सफल होता है तो इससे पूरे पश्चिम एशिया में तनाव कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही लेबनान, इजरायल और खाड़ी क्षेत्र में भी स्थिरता आने की उम्मीद बढ़ेगी।
वैश्विक राजनीति पर पड़ेगा असर
अमेरिका और ईरान के बीच यह संभावित समझौता केवल दो देशों तक सीमित नहीं है। इसका असर वैश्विक राजनीति, तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ेगा। चीन, रूस और यूरोपीय देशों की नजर भी इस वार्ता पर बनी हुई है। यदि यह समझौता लागू होता है तो आने वाले महीनों में वैश्विक कूटनीति की दिशा बदल सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन के लिए यह समझौता राजनीतिक रूप से भी अहम है। अमेरिका में आगामी चुनावों और बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच व्हाइट हाउस पर युद्ध समाप्त करने का दबाव बढ़ रहा है।
आगे क्या?
अब पूरी दुनिया की नजर राष्ट्रपति ट्रंप के फैसले पर टिकी है। यदि वे इस समझौते को मंजूरी देते हैं तो अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय बाद औपचारिक और व्यापक वार्ता का रास्ता खुल सकता है। हालांकि कई कठिन मुद्दों पर अभी भी मतभेद बने हुए हैं, लेकिन फिलहाल यह समझौता क्षेत्र में शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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