Kartavya इन दिनों ओटीटी और सिनेमाघरों में लगातार आ रही क्राइम-थ्रिलर फिल्मों की भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करती है। गांव की राजनीति, भ्रष्ट सिस्टम, ऑनर किलिंग, धार्मिक प्रभाव और पुलिस जांच जैसे विषय अब दर्शकों के लिए नए नहीं रह गए हैं। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कहानियां इतनी बार दिखाई जा चुकी हैं कि अब दर्शक शुरुआती कुछ मिनटों में ही समझ जाते हैं कि फिल्म सच में कुछ कहना चाहती है या सिर्फ गंभीर और डार्क दिखने की कोशिश कर रही है।
‘कर्तव्य’ भी इसी जॉनर की फिल्म है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं Saif Ali Khan। सैफ अपने अभिनय से फिल्म को कई जगह संभाल लेते हैं, जहां कहानी और स्क्रीनप्ले कमजोर पड़ते नजर आते हैं। फिल्म में दमदार विषय, अच्छा माहौल और कुछ शानदार कलाकार मौजूद हैं, लेकिन इसकी राइटिंग हर मौके का पूरा फायदा नहीं उठा पाती।

गांव, राजनीति और अपराध की दुनिया
फिल्म की कहानी हरियाणा के काल्पनिक कस्बे झामली में सेट की गई है। यहां पुलिस अफसर पवन मलिक का किरदार निभा रहे सैफ अली खान एक ऐसे इंसान के रूप में सामने आते हैं, जो ड्यूटी, परिवार और सिस्टम के बीच बुरी तरह फंसा हुआ है।
कहानी की शुरुआत एक पत्रकार की हत्या से होती है, जिसकी जांच पवन मलिक कर रहे हैं। शुरुआत में यह मामला एक सामान्य मर्डर इन्वेस्टिगेशन जैसा लगता है, लेकिन धीरे-धीरे इसके तार गांव की राजनीति, धार्मिक ताकतों और सामाजिक दबावों से जुड़ने लगते हैं।
फिल्म की खास बात यह है कि यह सिर्फ अपराध की जांच तक सीमित नहीं रहती। इसके साथ-साथ पवन मलिक की निजी जिंदगी भी समानांतर रूप से चलती रहती है। उनके छोटे भाई का प्रेम विवाह करके भाग जाना कहानी में एक नया मोड़ लेकर आता है। मामला जाति, सम्मान और पारिवारिक दबाव की लड़ाई में बदल जाता है।
यही दो ट्रैक — पुलिस जांच और पारिवारिक संघर्ष — फिल्म को शुरुआत में दिलचस्प बनाते हैं। दोनों कहानियां जबरदस्ती जोड़ी हुई नहीं लगतीं। बल्कि शुरुआती एक घंटे तक फिल्म काफी मजबूती से आगे बढ़ती है।
शुरुआत मजबूत, लेकिन बाद में लड़खड़ाती है कहानी
फिल्म का पहला हाफ काफी प्रभावशाली लगता है। निर्देशक ने गांव के माहौल, राजनीतिक दबाव और सामाजिक तनाव को वास्तविक तरीके से दिखाने की कोशिश की है। आनंद श्री के आश्रम से जुड़ा ट्रैक भी दर्शकों को असहज महसूस कराता है और आज के सामाजिक माहौल से जुड़ा हुआ लगता है।
लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म अपनी पकड़ खोने लगती है। कहानी बार-बार दर्शकों को चौंकाने की कोशिश करती है। कुछ ट्विस्ट अच्छे लगते हैं, लेकिन कई ऐसे भी हैं जो सिर्फ कहानी को ज्यादा गंभीर और “रियलिस्टिक” दिखाने के लिए जोड़े गए महसूस होते हैं।
स्क्रीनप्ले दूसरे हिस्से में बिखरा हुआ लगता है। फिल्म कई बड़े मुद्दे उठाती है, लेकिन हर विषय को बराबर गहराई नहीं दे पाती। यही वजह है कि क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म का भावनात्मक असर कमजोर पड़ जाता है।
सैफ अली खान फिल्म की जान
अगर ‘कर्तव्य’ को देखने लायक कुछ बनाता है, तो वह हैं सैफ अली खान। Saif Ali Khan ने पवन मलिक के किरदार में वह गंभीरता और थकान दिखाई है, जो एक दबाव में जी रहे पुलिस अफसर में होनी चाहिए।
सैफ का अभिनय फिल्म को कई जगह गिरने से बचाता है। खास बात यह है कि उन्होंने अपने किरदार को सिर्फ एक “हीरो पुलिसवाले” की तरह नहीं निभाया, बल्कि उसे अंदर से टूटे हुए इंसान की तरह पेश किया है। कई सीन में वह बिना ज्यादा संवाद बोले असर छोड़ते हैं।
उनकी हरियाणवी टोन भी काफी नेचुरल लगती है। हालांकि, सेकेंड हाफ में उनका गुस्से वाला अंदाज थोड़ा दोहराव वाला महसूस होने लगता है, लेकिन फिर भी वह स्क्रीन पर सबसे मजबूत उपस्थिति बने रहते हैं।
सपोर्टिंग कास्ट ने भी छोड़ी छाप
Rasika Dugal ने पवन मलिक की पत्नी के किरदार में सादगी और सहजता दिखाई है। हालांकि फिल्म उनके टैलेंट का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाती। उनका किरदार अधिकतर एक सपोर्ट सिस्टम बनकर रह जाता है।
Sanjay Mishra छोटे रोल में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। वहीं Manish Chaudhari एक सख्त और अहंकारी अधिकारी के किरदार में फिट बैठते हैं।
सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं Zakir Hussain। उनका किरदार तनाव पैदा करता है और दर्शकों को बेचैन बनाए रखता है।
फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज युधवीर अहलावत हैं। कम उम्र में भी उन्होंने डर, दबाव और सामाजिक हिंसा के बीच फंसे युवक की बेचैनी को बहुत ईमानदारी से निभाया है। उनके इमोशनल सीन सीधे दिल पर असर करते हैं।
निर्देशन में दिखती है ‘भक्षक’ की झलक
फिल्म का निर्देशन पुलकित ने किया है, जिन्होंने इससे पहले Bhakshak जैसी गंभीर फिल्म बनाई थी। ‘कर्तव्य’ में भी उसी तरह का माहौल दिखाई देता है — भ्रष्ट सिस्टम, सत्ता का गलत इस्तेमाल और सामाजिक हिंसा।
निर्देशक ने गांव के वातावरण को काफी प्रभावशाली ढंग से दिखाया है। धूल भरी गलियां, राजनीतिक दबाव, धार्मिक प्रभाव और हर वक्त मंडराता खतरा स्क्रीन पर महसूस होता है।
कैमरा वर्क कई जगह कहानी से ज्यादा असर छोड़ता है। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की सबसे मजबूत तकनीकी खूबियों में से एक है। बैकग्राउंड स्कोर भी तनाव बनाए रखने में सफल रहता है।
लेकिन समस्या यह है कि फिल्म खुद को जरूरत से ज्यादा गंभीर बनाने की कोशिश करती है। कई दृश्य जरूरत से लंबे लगते हैं। निर्देशक हर मुद्दे को गहराई देना चाहते हैं, लेकिन यही कोशिश कई बार फिल्म की गति को धीमा कर देती है।
सामाजिक मुद्दों को उठाने की कोशिश
‘कर्तव्य’ सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है। फिल्म ऑनर किलिंग, जातिवाद, धार्मिक प्रभाव, मीडिया दबाव और पुलिस सिस्टम जैसे मुद्दों पर भी बात करने की कोशिश करती है।
हालांकि, इतने सारे विषयों को एक साथ संभालना फिल्म के लिए मुश्किल साबित होता है। कुछ मुद्दे बहुत असरदार बनते हैं, जबकि कुछ अधूरे रह जाते हैं।
फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि सिस्टम के अंदर काम करने वाला ईमानदार व्यक्ति किस तरह हर तरफ से दबाव में आ जाता है। पवन मलिक का किरदार इसी संघर्ष का प्रतीक बनकर सामने आता है।
क्या फिल्म देखने लायक है?
अगर आपको डार्क क्राइम ड्रामा, गांव की राजनीति और पुलिस जांच वाली कहानियां पसंद हैं, तो ‘कर्तव्य’ एक बार देखी जा सकती है। फिल्म का माहौल, अभिनय और कुछ मजबूत दृश्य इसे औसत फिल्मों से बेहतर बनाते हैं।
लेकिन अगर आप Drishyam, Article 15 या Sacred Games जैसी गहराई और कसावट की उम्मीद लेकर जाएंगे, तो ‘कर्तव्य’ थोड़ी अधूरी महसूस हो सकती है।
फिल्म के पास मजबूत मुद्दे थे, शानदार कलाकार थे और एक अच्छा माहौल भी था, लेकिन स्क्रीनप्ले अपना पूरा “कर्तव्य” निभाने में सफल नहीं हो पाया। फिर भी सैफ अली खान की दमदार परफॉर्मेंस इस फिल्म को देखने लायक जरूर बना देती है।
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