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गुरु पर्व की लख-लख बधाइयां

श्री गुरु नानक देव जी का प्रकाश राय भोए की तलवंडी (अब ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में 1469 ई. में कल्याण दास मेहता जी (मेहता कालू जी) के यहां हुआ। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इनका प्रकाश 15 अप्रैल 1469 ई. (वैसाख सुदी 3, 1526 विक्रमी) को हुआ पर विश्व भर में इनका प्रकाश गुरपुरब कार्तिक पूर्णिमा को ही मनाया जाता है। बचपन से ही आपका मन प्रभु की भक्ति में लीन रहता था तथा जरूरतमंद लोगों की मदद करना इनका स्वभाव था। इन्हें पढऩे के लिए पंडित जी तथा मौलवी दोनों के पास भेजा गया। गुरु जी बचपन से ही संत-महापुरुषों की संगत किया करते थे। 9 वर्ष की आयु में जब इन्हें जनेऊ पहनने को कहा गया तो इन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि उन्हें तो ऐसा जनेऊ पहनाया जाए, जो न तो कभी टूट सके तथा न ही गंदा हो सके और न ही अग्नि उसे जला सके।

जब गुरु जी कुछ और बड़े हुए तो उन्हें कारोबार सिखाने के लिए 20 रुपए देकर सामान खरीदने के लिए भेजा गया ताकि उसे अधिक मूल्य पर बेचकर मुनाफा कमाया जा सके परंतु गुरु जी ने गांव चूहड़काना में कई दिनों से भूखे-प्यासे बैठे संत-महापुरुषों को इन 20 रुपयों का भोजन खिलाया तथा कहा कि यह सच्चा सौदा है। जब गुरु जी घर पहुंचे तो पिता जी उन पर बहुत नाराज हुए परंतु गुरु जी की बहन बीबी नानकी जी ने अपने पिता जी को समझाया कि ये कोई साधारण पुरुष नहीं बल्कि भगवान ने उन्हें किसी विशेष कार्य के लिए भेजा है।

इनकी बड़ी बहन बीबी नानकी जी इन्हें अपने ससुराल सुल्तानपुर लोधी ले आईं जहां इन्हें मोदीखाने में नौकरी मिल गई परंतु इनका ध्यान यहां भी प्रभु भक्ति में लगा रहता। जो भी जरूरतमंद इनके पास आता, ये उसे भोजन या राशन दे देते थे।

गुरु नानक देव जी इस दुनिया में भूले-भटके लोगों को सत्य का मार्ग दिखलाने आए थे। अपने मिशन को वह पूरे देश-विदेश का भ्रमण करके ही पूरा कर सकते थे। इसी आशा को लेकर आप नित्य की तरह सुल्तानपुर के निकट से बहती वेईं नदी में स्नान करने के लिए गए और 3 दिन तक बाहर न आए। लोगों ने सोचा कि गुरु जी नदी में डूब गए हैं परंतु तीसरे दिन आप जी जब नदी से बाहर निकले तो आपने कहा कि न कोई हिन्दू न मुसलमान।

इस पर विवाद खड़ा हो गया परंतु गुरु जी ने सभी को समझाया कि कोई किसी भी धर्म में रहे परन्तु मनुष्य को इंसान बनना है, इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।

अपने मिशन को पूरा करने के लिए गुरु जी ने चारों दिशाओं में 4 लम्बी यात्राएं कीं, जिन्हें ‘चार उदासियां’ कहा जाता है। इन यात्राओं में गुरु जी ने देश-विदेश का भ्रमण किया तथा लोगों को सत्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।

गुरु जी ने पहाड़ों में बैठे योगियों तथा सिद्धों के साथ भी वार्ताएं कीं तथा उन्हें दुनिया में जाकर लोगों को परमात्मा के साथ जोडऩे के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए उत्साहित किया।

इन्होंने गृहस्थ मार्ग को सर्वोत्तम माना तथा स्वयं भी गृहस्थ जीवन व्यतीत किया। इनकी शादी पक्खो की रंधावा (गुरदासपुर) के रहने वाले पटवारी मूला चोणा की सुपुत्री सुलक्षणी जी से मूला जी के पैतृक गांव बटाला में हुई। इनके 2 पुत्र बाबा श्रीचंद तथा बाबा लक्ष्मी दास जी थे।

भाई गुरदास जी के अनुसार गुरु नानक देव जी अपनी यात्राएं (उदासियां) पूरी करने के बाद करतारपुर साहिब आ गए। उन्होंने उदासियों का भेष उतारकर सांसारिक वस्त्र धारण कर लिए। सत्संग प्रतिदिन होने लगा। गुरु जी स्वयं खेतीबाड़ी का काम करने लगे तथा दूर-दूर से लोग गुरु जी के पास धर्म कल्याण के लिए आने लगे।

यहां पर भाई लहणा जी गुरु जी के दर्शनों के लिए आए तथा सदैव के लिए गुरु जी के ही होकर रह गए। आप जी ने अपने पुत्रों को गुरु गद्दी नहीं दी बल्कि त्याग, आज्ञाकारी एवं सेवा की मूर्त भाई लहना जी की कई कठिन परीक्षाएं लेने के बाद हर तरह से योग्य पाकर उन्हें गुरु गद्दी सौंप दी और उनका नाम गुरु अंगद देव जी रखा। गुरु नानक देव जी 1539 ई. में करतारपुर साहिब में ज्योति ज्योति समा गए।

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