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Super El Nino : सुपर अल नीनो का बढ़ता खतरा, 2027 तक बढ़ सकती है गर्मी, सूखा और बाढ़

सुपर अल नीनो का बढ़ता खतरा! 2027 तक बढ़ सकती है गर्मी, सूखा और बाढ़; भारत समेत दुनिया पर असर

प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहा अल नीनो अब बेहद शक्तिशाली स्थिति की ओर बढ़ रहा है। विश्व मौसम संगठन यानी WMO ने सितंबर 2026 की अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि मौजूदा अल नीनो आने वाले महीनों में और मजबूत हो सकता है और साल के अंत तक इसकी तीव्रता बहुत ज्यादा रहने की संभावना है। इसके प्रभाव 2027 की शुरुआत तक जारी रह सकते हैं।

वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों की चिंता इसलिए बढ़ गई है क्योंकि इस बार प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय हिस्से का समुद्री तापमान सामान्य से काफी ज्यादा है। WMO के मुताबिक, फरवरी 2027 तक अल नीनो के बने रहने की संभावना करीब 100 प्रतिशत है। संगठन ने इसे हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण जलवायु घटनाओं में से एक बताया है, क्योंकि इससे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तापमान और बारिश के सामान्य पैटर्न में बड़ा बदलाव आ सकता है।

क्या है सुपर अल नीनो?

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक गर्म हो जाता है। समुद्र के तापमान में यह बदलाव वातावरण में भी परिवर्तन पैदा करता है, जिसका असर हजारों किलोमीटर दूर मौजूद देशों के मौसम पर पड़ सकता है।

जब अल नीनो बहुत मजबूत हो जाता है, तो इसे आम तौर पर ‘सुपर अल नीनो’ कहा जाता है। हालांकि, WMO अपनी रिपोर्ट में मुख्य रूप से इसे ‘very strong El Niño’ यानी बहुत मजबूत अल नीनो कह रहा है। हालिया रिपोर्टों में वैज्ञानिकों ने इसे रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने की संभावित क्षमता वाला बताया है।

WMO के सितंबर अपडेट के अनुसार, सितंबर से नवंबर 2026 के दौरान Niño 3.4 समुद्री सतह तापमान विसंगति का मॉडल औसत करीब 3.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान है। पूर्वानुमान मॉडल नवंबर-दिसंबर के आसपास इसकी तीव्रता के चरम की ओर इशारा कर रहे हैं।

2027 तक क्यों बनी रहेगी चिंता?

अल नीनो का असर केवल उस समय तक सीमित नहीं रहता, जब प्रशांत महासागर का तापमान चरम पर होता है। समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाले बदलाव कई महीनों तक मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं।

WMO के मुताबिक, मौजूदा घटना के सितंबर-नवंबर 2026 और दिसंबर 2026-फरवरी 2027 दोनों अवधियों में बने रहने की संभावना करीब 100 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि 2026 के अंत से लेकर 2027 की शुरुआत तक दुनिया के कई हिस्सों में असामान्य मौसम की स्थिति बनी रह सकती है।

हालांकि, किसी देश में इसका असर कितना होगा, यह केवल अल नीनो की ताकत पर निर्भर नहीं करता। स्थानीय मौसम, हिंद महासागर की स्थिति, अटलांटिक महासागर और अन्य जलवायु परिस्थितियां भी इसके प्रभाव को बदल सकती हैं। WMO ने भी स्पष्ट किया है कि मजबूत अल नीनो का मतलब हर क्षेत्र में एक जैसा मौसम नहीं होता।

भारत के लिए क्या मायने रखता है?

भारत में अल नीनो का नाम आते ही सबसे बड़ी चिंता मानसून और तापमान को लेकर होती है। ऐतिहासिक रूप से अल नीनो भारत सहित दक्षिण एशिया के मानसून पैटर्न को प्रभावित कर सकता है, लेकिन हर अल नीनो वर्ष में भारत में बारिश का असर एक जैसा नहीं रहा है।

इसलिए मौजूदा स्थिति को सीधे तौर पर पूरे भारत में सूखे की निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता। WMO के अनुसार, अल नीनो के प्रभाव क्षेत्र और मौसम के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं।

फिर भी, मजबूत अल नीनो के कारण अत्यधिक गर्मी, बारिश में बदलाव और लंबे शुष्क दौर का जोखिम बढ़ सकता है। इसका असर खेती, सिंचाई, जलाशयों और बिजली की मांग पर पड़ सकता है।

भारत में गर्मी बढ़ने पर एयर कंडीशनर और कूलर का इस्तेमाल बढ़ता है, जिससे बिजली की मांग भी ऊपर जा सकती है। सितंबर 2026 में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, भारत के करीब 40 प्रतिशत कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में ईंधन का भंडार गंभीर रूप से कम था और गर्म मौसम के कारण बिजली की मांग बढ़ने की बात सामने आई।

खेती पर भी पड़ सकता है असर

अल नीनो का सबसे बड़ा आर्थिक असर कृषि क्षेत्र में दिखाई दे सकता है। बारिश के समय और मात्रा में बदलाव होने पर किसानों को बुवाई और कटाई का समय बदलना पड़ सकता है।

दुनिया के दूसरे हिस्सों में इसका असर पहले से दिखाई देने लगा है। इंडोनेशिया में मौसम विभाग ने 2026 की बारिश में देरी का अनुमान जताया है। वहां करीब 61 प्रतिशत भू-भाग में बारिश का मौसम देर से शुरू होने की संभावना बताई गई है। इससे चावल, गन्ना, कोको और पाम ऑयल जैसी फसलों पर दबाव बढ़ सकता है।

अगर कई प्रमुख कृषि उत्पादक देशों में उत्पादन प्रभावित होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है। खासकर चावल, चीनी, तेल और अन्य कृषि उत्पादों की आपूर्ति पर मौसम का असर पड़ सकता है।

कहीं सूखा तो कहीं बाढ़

सुपर अल नीनो का मतलब पूरी दुनिया में सिर्फ गर्मी या सूखा नहीं है। इसकी वजह से कुछ क्षेत्रों में बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है।

WMO ने चेतावनी दी है कि बहुत मजबूत अल नीनो बारिश और तापमान के पैटर्न में बड़े बदलाव ला सकता है। इसके परिणामस्वरूप दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अत्यधिक गर्मी, भारी बारिश, बाढ़ और सूखे का जोखिम बढ़ सकता है।

मध्य अमेरिका में भी सुपर अल नीनो को लेकर खाद्य सुरक्षा की चिंता जताई गई है। कुछ देशों में सूखे और कृषि उत्पादन पर संभावित असर के कारण खाद्य, ईंधन और उर्वरक की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका व्यक्त की गई है।

क्या 2027 सबसे गर्म साल बन सकता है?

एक और बड़ी चिंता यह है कि अल नीनो पहले से मौजूद ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को और बढ़ा सकता है। 2024 में मजबूत अल नीनो ने वैश्विक तापमान को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचाने में योगदान दिया था। अब 2026-27 का मजबूत अल नीनो फिर से वैश्विक तापमान को ऊपर धकेल सकता है।

हालांकि, किसी एक घटना के आधार पर यह निश्चित कहना सही नहीं होगा कि 2027 हर हाल में दुनिया का सबसे गर्म साल बनेगा। वैज्ञानिक पूर्वानुमान संभावनाओं पर आधारित होते हैं और समुद्र-वायुमंडल की बदलती परिस्थितियां परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं।

दुनिया के लिए आगे की चुनौती

मौजूदा स्थिति में सबसे बड़ा मुद्दा सिर्फ तापमान बढ़ना नहीं है, बल्कि एक साथ कई मौसम संबंधी जोखिमों का बढ़ना है। अत्यधिक गर्मी से स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है, सूखे से खेती प्रभावित हो सकती है और भारी बारिश से बाढ़ तथा बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है।

WMO ने इसी वजह से सरकारों और मौसम विभागों को शुरुआती चेतावनी और तैयारी मजबूत करने पर जोर दिया है। संगठन का कहना है कि बहुत मजबूत अल नीनो की स्थिति में समय रहते मौसम संबंधी जानकारी का इस्तेमाल करके कृषि, स्वास्थ्य, जल प्रबंधन और आपदा तैयारी में कदम उठाए जा सकते हैं।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अल नीनो तेजी से मजबूत हो रहा है और इसके 2026 के अंत में चरम पर पहुंचने तथा फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना बहुत अधिक है। भारत समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इसका असर एक जैसा नहीं होगा, लेकिन गर्मी, बारिश, सूखा और बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं के जोखिम पर नजर रखना आने वाले महीनों में बेहद जरूरी रहेगा।

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