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RSS Agenda : ‘वंदे मातरम्’ पर केरल में सियासत तेज, पिनाराई विजयन ने सरकार पर लगाया आरएसएस एजेंडा थोपने का आरोप

‘वंदे मातरम्’ पर केरल में फिर सियासत तेज, पिनाराई विजयन ने सरकार पर लगाया RSS एजेंडा थोपने का आरोप

तिरुवनंतपुरम: स्वतंत्रता दिवस समारोहों में ‘वंदे मातरम्’ के पूरे संस्करण के गायन को लेकर केरल की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और CPI(M) नेता पिनाराई विजयन ने राज्य सरकार के उस निर्देश पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण गाने की बात कही गई है। विजयन ने सरकार से इस निर्देश को वापस लेने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि इसके जरिए RSS के वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब देशभर में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान और ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। केरल सरकार की ओर से जारी निर्देश को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं, जबकि इस मुद्दे ने राष्ट्रगीत, धर्मनिरपेक्षता और सरकारी समारोहों में राष्ट्रीय प्रतीकों के इस्तेमाल को लेकर पुरानी राजनीतिक बहस को फिर हवा दे दी है।

पूरे ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर विजयन की आपत्ति

पिनाराई विजयन का कहना है कि देश में स्वतंत्रता दिवस या अन्य सरकारी समारोहों में ‘वंदे मातरम्’ के पूरे संस्करण को अनिवार्य रूप से गाने की कोई स्थापित परंपरा नहीं रही है। उनके मुताबिक, राष्ट्रगीत की शुरुआती पंक्तियों के गायन की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और इसे अचानक पूरे गीत के अनिवार्य गायन में बदलना उचित नहीं है।

विजयन ने राज्य सरकार से अपने निर्देश पर पुनर्विचार करने और उसे वापस लेने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस फैसले के पीछे केवल प्रशासनिक कारण नहीं हैं, बल्कि इसके माध्यम से एक विशेष राजनीतिक और वैचारिक सोच को सरकारी कार्यक्रमों में बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।

उनका आरोप है कि RSS के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए ‘वंदे मातरम्’ के पूरे संस्करण को सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, सरकार की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया इस विवाद को और स्पष्ट कर सकती है।

6 अगस्त के निर्देश के बाद शुरू हुआ विवाद

‘वंदे मातरम्’ को लेकर विवाद की शुरुआत केरल के मुख्य सचिव की ओर से जारी एक सरकारी पत्र के बाद हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, यह पत्र 6 अगस्त को जारी किया गया था। पत्र में केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय की ओर से ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के संबंध में जारी निर्देशों का संदर्भ दिया गया था।

‘हर घर तिरंगा’ अभियान इस वर्ष 9 अगस्त से 17 अगस्त तक आयोजित किया जा रहा है। अभियान का उद्देश्य स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लोगों को अपने घरों और प्रतिष्ठानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए प्रोत्साहित करना है।

इसी अवधि के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में भी देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। राज्य सरकार की ओर से जारी निर्देश में केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप ‘वंदे मातरम्’ के गायन की व्यवस्था करने की बात कही गई है।

यही निर्देश अब केरल में राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।

‘धर्मनिरपेक्ष परंपरा से समझौता’ का आरोप

पिनाराई विजयन ने सरकार के फैसले को केरल की धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक और सामाजिक परंपरा से जोड़ते हुए सवाल उठाया है। उनका कहना है कि सरकारी कार्यक्रमों में ऐसे फैसले नहीं लिए जाने चाहिए, जिनसे समाज के किसी वर्ग को यह महसूस हो कि उस पर किसी विशेष विचारधारा या धार्मिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण को थोपा जा रहा है।

विजयन ने राज्य की UDF सरकार और उसके नेतृत्व पर भी निशाना साधा। उनका दावा है कि सरकारी समारोह में ‘वंदे मातरम्’ के पूरे संस्करण को अनिवार्य रूप से शामिल करना कांग्रेस की पारंपरिक धर्मनिरपेक्ष राजनीति के अनुरूप नहीं है।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार राजनीतिक और वैचारिक दबाव में इस तरह के फैसले ले रही है। हालांकि, इन आरोपों को लेकर सरकार या UDF नेतृत्व का पक्ष सामने आना इस राजनीतिक विवाद में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

शपथ ग्रहण समारोह में भी उठा था मुद्दा

‘वंदे मातरम्’ को लेकर पिनाराई विजयन की आपत्ति कोई पहली घटना नहीं है। उन्होंने हाल ही में हुए UDF कैबिनेट के शपथ ग्रहण समारोह का भी जिक्र किया, जहां ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण गाए जाने को लेकर उन्होंने सवाल उठाया था।

विजयन का तर्क है कि सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत या राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल ऐसी संवेदनशीलता के साथ किया जाना चाहिए, जिससे समाज के सभी वर्ग खुद को उससे जुड़ा हुआ महसूस करें।

उनके मुताबिक, किसी सरकारी समारोह को राजनीतिक या वैचारिक संदेश का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। इसी आधार पर वह वर्तमान निर्देश को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर देशभर में कार्यक्रम

इस वर्ष ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के कारण यह गीत राष्ट्रीय स्तर पर विशेष चर्चा में है। केंद्र सरकार की ओर से इसके अवसर पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में ‘वंदे मातरम्’ का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रवादी भावना का एक प्रमुख प्रतीक बनी थी।

समय के साथ इसके कुछ हिस्सों का इस्तेमाल राष्ट्रीय और सरकारी समारोहों में किया जाता रहा है। इसी इतिहास और परंपरा को देखते हुए केंद्र सरकार की ओर से इसके 150 वर्ष पूरे होने पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

लेकिन इसके पूरे संस्करण के गायन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग मत भी सामने आते रहे हैं।

संसद में कानून के बाद बढ़ी संवेदनशीलता

‘वंदे मातरम्’ को लेकर मौजूदा विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में संसद में इससे संबंधित कानूनी प्रावधानों को लेकर चर्चा हुई है। संसद द्वारा पारित Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 के जरिए ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान से जुड़े कानूनी संरक्षण के दायरे में लाने का प्रावधान किया गया है।

संशोधित प्रावधानों के तहत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को जानबूझकर रोकना या उसके गायन में बाधा डालना दंडनीय प्रावधानों के दायरे में लाने की व्यवस्था की गई है।

ऐसे में केरल में सरकारी समारोहों में ‘वंदे मातरम्’ के इस्तेमाल को लेकर उठा विवाद केवल एक राज्य सरकार के प्रशासनिक निर्देश तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब राष्ट्रीय प्रतीकों, अभिव्यक्ति, संवैधानिक मूल्यों और राजनीतिक विचारधारा से जुड़े व्यापक सवालों से भी जुड़ गया है।

राजनीतिक टकराव बढ़ने के आसार

केरल में सत्तारूढ़ UDF और विपक्षी CPI(M) के बीच पहले से ही कई मुद्दों पर राजनीतिक टकराव जारी है। ऐसे में ‘वंदे मातरम्’ का मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस को और तेज कर सकता है।

एक तरफ केंद्र सरकार और उसके समर्थक ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय गौरव से जोड़कर इसके सम्मान पर जोर दे रहे हैं। दूसरी तरफ पिनाराई विजयन जैसे विपक्षी नेता सरकारी समारोहों में इसके पूरे संस्करण को अनिवार्य किए जाने पर सवाल उठा रहे हैं।

विवाद का मुख्य सवाल अब यही है कि क्या स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय समारोहों में ‘वंदे मातरम्’ के पूरे संस्करण का गायन प्रशासनिक निर्देश के जरिए अनिवार्य किया जाना चाहिए या फिर इसके इस्तेमाल को मौजूदा परंपराओं और संवेदनशीलताओं के अनुरूप रखा जाना चाहिए।

फिलहाल, पिनाराई विजयन के आरोपों के बाद केरल में यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। सरकार की ओर से इस पर आने वाला विस्तृत जवाब यह तय करेगा कि विवाद आगे केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या फिर राज्य की राजनीति में इसका बड़ा असर देखने को मिलता है।

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