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Liquidity Control : आरबीआई ने बॉन्ड बेचकर 50 हजार करोड़ रुपये बाजार से निकाले

RBI ने बाजार से खींचे 50 हजार करोड़ रुपये, सरकारी बॉन्ड बेचकर बैंकिंग सिस्टम की अतिरिक्त नकदी पर लगाम

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम में लगातार बढ़ रही अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के तहत सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री का पहला चरण पूरा कर लिया है। इस प्रक्रिया के तहत आरबीआई ने कुल 50,000 करोड़ रुपये की बोलियां स्वीकार कीं। इसके परिणामस्वरूप इतनी ही राशि बैंकिंग सिस्टम से निकलकर केंद्रीय बैंक के पास पहुंच गई।

आरबीआई का यह कदम ऐसे समय में आया है, जब देश के बैंकिंग सिस्टम में जरूरत से ज्यादा नकदी उपलब्ध है। अतिरिक्त लिक्विडिटी की वजह से बैंकों के पास कर्ज देने और बाजार में धन का प्रवाह बढ़ाने की क्षमता अधिक हो जाती है। केंद्रीय बैंक मौद्रिक व्यवस्था को संतुलित रखने के लिए समय-समय पर बाजार से अतिरिक्त नकदी को वापस खींचता है।

सरकारी बॉन्ड की बिक्री से निकाली गई रकम

आरबीआई की ओएमओ नीलामी में अलग-अलग अवधि वाले सरकारी बॉन्ड शामिल रहे। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 8.28 प्रतिशत कूपन वाले 2032 में परिपक्व होने वाले सरकारी बॉन्ड के लिए सबसे ज्यादा 18,840 करोड़ रुपये की बोलियां स्वीकार की गईं। इस बॉन्ड की कट-ऑफ यील्ड 7.0090 प्रतिशत रही।

इसके अलावा 5.77 प्रतिशत ब्याज दर वाले 2030 के सरकारी बॉन्ड की 12,645 करोड़ रुपये की बोलियां स्वीकार की गईं। वहीं 7.61 प्रतिशत कूपन वाले 2030 के बॉन्ड के लिए 1,005 करोड़ रुपये की बोलियां स्वीकार हुईं।

आरबीआई ने 7.59 प्रतिशत कूपन वाले 2029 के सरकारी बॉन्ड से 7,005 करोड़ रुपये, 6.79 प्रतिशत कूपन वाले 2029 के बॉन्ड से 7,255 करोड़ रुपये और 6.68 प्रतिशत कूपन वाले 2031 के बॉन्ड से 3,250 करोड़ रुपये की बोलियां स्वीकार कीं। इन सभी बिक्री के जरिए केंद्रीय बैंक ने कुल 50,000 करोड़ रुपये सिस्टम से वापस खींच लिए।

बैंकिंग सिस्टम में क्यों बढ़ गई थी इतनी नकदी?

16 सितंबर तक भारतीय बैंकिंग सिस्टम में करीब 7.38 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त लिक्विडिटी होने का अनुमान था। इतनी बड़ी मात्रा में अतिरिक्त नकदी आने के पीछे कई कारक बताए जा रहे हैं।

इनमें विदेशी मुद्रा जमा से जुड़ी FCNR-B डिपॉजिट व्यवस्था महत्वपूर्ण रही। विदेशी मुद्रा जमा में बढ़ोतरी के बाद बैंकों ने आरबीआई के साथ स्वैप व्यवस्था के जरिए रुपये हासिल किए। इससे बैंकिंग सिस्टम में रुपये की उपलब्धता बढ़ी।

इसके अलावा सरकारी खर्च भी सिस्टम में नकदी बढ़ने की एक वजह रहा। वेतन, पेंशन और अन्य सरकारी भुगतान के माध्यम से बड़ी रकम बैंकों और लोगों के खातों तक पहुंचती है। इससे कुछ समय के लिए बैंकिंग सिस्टम में नकदी का स्तर सामान्य से काफी ऊपर जा सकता है।

अतिरिक्त नकदी से RBI को क्या चिंता?

बैंकिंग सिस्टम में जरूरत से ज्यादा पैसा होने पर बाजार में कर्ज की उपलब्धता बढ़ सकती है। इससे आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिल सकता है, लेकिन यदि नकदी का प्रवाह बहुत ज्यादा हो जाए तो महंगाई और वित्तीय बाजारों पर दबाव से जुड़े जोखिम भी बढ़ सकते हैं।

इसी वजह से आरबीआई लिक्विडिटी की स्थिति पर लगातार नजर रखता है और जरूरत के अनुसार अलग-अलग मौद्रिक साधनों का इस्तेमाल करता है। ओएमओ के जरिए सरकारी प्रतिभूतियां बेचकर नकदी को सिस्टम से वापस खींचना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

अभी दो और चरण बाकी

आरबीआई ने बैंकिंग सिस्टम की अतिरिक्त नकदी को धीरे-धीरे कम करने के लिए कुल 1 लाख करोड़ रुपये की ओएमओ बिक्री की योजना बनाई है। इसे तीन चरणों में पूरा किया जाना है।

पहले चरण में 50,000 करोड़ रुपये की बिक्री हो चुकी है। इसके बाद 25,000-25,000 करोड़ रुपये की दो और ओएमओ नीलामियां प्रस्तावित हैं। ये नीलामियां क्रमशः 21 सितंबर और 28 सितंबर को आयोजित की जानी हैं।

आरबीआई के इस कदम पर अब बाजार की नजर रहेगी। आने वाले दिनों में बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का स्तर किस तरह बदलता है और इसका असर सरकारी बॉन्ड यील्ड, ब्याज दरों तथा मुद्रा बाजार पर कितना पड़ता है, यह महत्वपूर्ण रहेगा।

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