भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2025-26 में विदेशी मुद्रा प्रबंधन और निवेश गतिविधियों के जरिए रिकॉर्ड आय अर्जित की है। केंद्रीय बैंक की वार्षिक रिपोर्ट और खातों के अनुसार, 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष में विदेशी मुद्रा लेनदेन से RBI को 1.69 लाख करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 52 प्रतिशत अधिक है। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में विदेशी मुद्रा लेनदेन से केंद्रीय बैंक का लाभ 1.11 लाख करोड़ रुपये रहा था।

यह बढ़ोतरी ऐसे समय में दर्ज की गई है जब भारतीय रुपये पर वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, डॉलर की मजबूती और विदेशी पूंजी प्रवाह में उतार-चढ़ाव का दबाव बना हुआ था। रुपये में आई कमजोरी को नियंत्रित करने और विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए RBI ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार से बड़े पैमाने पर अमेरिकी डॉलर की बिक्री की। इसी रणनीति के परिणामस्वरूप केंद्रीय बैंक को विदेशी मुद्रा लेनदेन से उल्लेखनीय लाभ प्राप्त हुआ।
रुपये को सहारा देने के लिए बढ़ाई डॉलर बिक्री
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारतीय रुपये में लगभग 9.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। रुपये की इस कमजोरी के बीच RBI ने विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप करते हुए स्पॉट मार्केट में रिकॉर्ड 53.13 अरब डॉलर की बिक्री की। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य रुपये में अत्यधिक गिरावट को रोकना और बाजार में स्थिरता बनाए रखना था।
जब RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार में मौजूद डॉलर को बाजार में बेचता है, तो वह केवल विनिमय दर को स्थिर करने का काम नहीं करता, बल्कि कई बार इससे उसे वित्तीय लाभ भी होता है। विदेशी मुद्रा भंडार में रखे गए डॉलर और अन्य विदेशी परिसंपत्तियां अलग-अलग समय पर अलग कीमतों पर खरीदी जाती हैं। जब इन परिसंपत्तियों को उच्च विनिमय दर या अनुकूल बाजार परिस्थितियों में बेचा जाता है, तो केंद्रीय बैंक को लाभ प्राप्त होता है। वित्त वर्ष 2025-26 में इसी प्रक्रिया के कारण विदेशी मुद्रा लेनदेन से होने वाला लाभ उल्लेखनीय रूप से बढ़ गया।
विदेशी स्रोतों से RBI की आय में 27% का उछाल
RBI की वार्षिक वित्तीय रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी स्रोतों से होने वाली कुल आय वित्त वर्ष 2025-26 में 27 प्रतिशत बढ़कर 3.28 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई। पिछले वित्त वर्ष की तुलना में यह वृद्धि केंद्रीय बैंक के विदेशी निवेश पोर्टफोलियो से बेहतर रिटर्न और विदेशी मुद्रा लेनदेन से बढ़ी कमाई का परिणाम रही।
विदेशी स्रोतों से होने वाली आय में सबसे महत्वपूर्ण योगदान विदेशी प्रतिभूतियों (Foreign Securities) पर प्राप्त ब्याज आय का रहा। इस मद में RBI की आय 11 प्रतिशत बढ़कर 1.08 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि एक वर्ष पहले यह लगभग 97,000 करोड़ रुपये थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा वैश्विक स्तर पर सुरक्षित और उच्च गुणवत्ता वाली सरकारी प्रतिभूतियों तथा अन्य वित्तीय साधनों में निवेश करता है। इन निवेशों पर मिलने वाला ब्याज केंद्रीय बैंक की आय का महत्वपूर्ण स्रोत होता है। हाल के वर्षों में विकसित देशों में ब्याज दरों में वृद्धि और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में सुधार के कारण RBI को अपने विदेशी निवेशों से अधिक रिटर्न प्राप्त हुआ।
विदेशी मुद्रा भंडार बना मजबूत सुरक्षा कवच
31 मार्च 2026 तक भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 691 अरब डॉलर रहा। यह स्तर भारत को वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और बाहरी झटकों से सुरक्षा प्रदान करता है।
RBI के आंकड़ों के अनुसार, यह विदेशी मुद्रा भंडार देश के लगभग 11 महीनों के आयात बिल को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। इसके अलावा, यह भारत के कुल बाहरी ऋण (External Debt) का लगभग 90 प्रतिशत कवर करता है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार निवेशकों के विश्वास को बढ़ाता है और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में भारत की साख को मजबूत करता है।
आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक, बड़े विदेशी मुद्रा भंडार के कारण RBI के पास जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप करने और रुपये की अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने की पर्याप्त क्षमता रहती है। यही कारण है कि वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान रिकॉर्ड डॉलर बिक्री के बावजूद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत स्तर पर बना रहा।
घरेलू स्रोतों से भी बढ़ी कमाई
विदेशी आय के अलावा RBI की घरेलू स्रोतों से होने वाली शुद्ध आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2025-26 में घरेलू स्रोतों से प्राप्त शुद्ध आय 26 प्रतिशत बढ़कर लगभग 1 लाख करोड़ रुपये हो गई।
इस वृद्धि का प्रमुख कारण रुपये में अंकित सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) पर मिलने वाली ब्याज आय रही। इस श्रेणी में RBI की आय 38 प्रतिशत बढ़कर 1.18 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई। ब्याज दरों में बदलाव और सरकारी बॉन्ड होल्डिंग्स पर बेहतर रिटर्न ने इस आय वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
RBI देश की मौद्रिक व्यवस्था को संचालित करने के साथ-साथ सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश भी करता है। इन निवेशों से मिलने वाला ब्याज केंद्रीय बैंक की आय का प्रमुख घरेलू स्रोत माना जाता है।
बैलेंस शीट में 21% की वृद्धि
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान RBI की कुल बैलेंस शीट का आकार भी तेजी से बढ़ा। केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट 21 प्रतिशत बढ़कर 91.97 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यह वृद्धि विदेशी परिसंपत्तियों, घरेलू निवेशों और वित्तीय गतिविधियों के विस्तार को दर्शाती है।
साथ ही RBI ने जोखिम प्रबंधन को मजबूत करने के उद्देश्य से 1.09 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान (Provisioning) किया। इस राशि को केंद्रीय बैंक के कंटिंजेंसी फंड में स्थानांतरित किया गया है। कंटिंजेंसी फंड का उपयोग भविष्य में संभावित वित्तीय जोखिमों, बाजार अस्थिरता और अप्रत्याशित आर्थिक परिस्थितियों से निपटने के लिए किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक आर्थिक जोखिमों और भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच RBI का यह कदम उसकी वित्तीय मजबूती और सतर्कता को दर्शाता है।
सरकार को मिलेगा रिकॉर्ड सरप्लस ट्रांसफर
वित्त वर्ष 2025-26 में मजबूत आय और बढ़े हुए लाभ के चलते RBI केंद्र सरकार को रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का सरप्लस ट्रांसफर करेगा। यह भारतीय इतिहास में केंद्रीय बैंक द्वारा सरकार को हस्तांतरित की जाने वाली सबसे बड़ी राशि में से एक है।
यह सरप्लस ट्रांसफर सरकार के राजकोषीय प्रबंधन को मजबूती देगा और सार्वजनिक खर्च, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं तथा विकास कार्यक्रमों के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराएगा। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस अतिरिक्त राशि से सरकार को वित्तीय घाटे को नियंत्रित रखने में भी मदद मिल सकती है।
क्या संकेत देते हैं ये आंकड़े?
वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि RBI ने एक ओर विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप कर रुपये की स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर विदेशी मुद्रा भंडार और निवेश पोर्टफोलियो के प्रभावी प्रबंधन के जरिए रिकॉर्ड आय भी अर्जित की। विदेशी मुद्रा लेनदेन से 1.69 लाख करोड़ रुपये का मुनाफा, विदेशी स्रोतों से 3.28 लाख करोड़ रुपये की आय और सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये का सरप्लस ट्रांसफर इस बात का संकेत है कि केंद्रीय बैंक की वित्तीय स्थिति मजबूत बनी हुई है।
आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियां, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेश प्रवाह रुपये की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ऐसे में RBI की विदेशी मुद्रा प्रबंधन रणनीति भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता बनाए रखने के लिए बेहद अहम बनी रहेगी।
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