
वाशिंगटन: अमेरिका में नौकरी करने का सपना देख रहे विदेशी पेशेवरों, खासकर भारतीय आईटी कर्मचारियों के लिए ट्रंप प्रशासन ने एक बार फिर बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ नए H-1B वीजा आवेदनों पर लागू 1 लाख डॉलर के भुगतान की व्यवस्था को एक और साल के लिए बढ़ा दिया है। व्हाइट हाउस के मुताबिक, यह व्यवस्था अब सितंबर 2027 तक जारी रहेगी। यह नियम मुख्य रूप से उन H-1B कर्मचारियों से संबंधित है जो अमेरिका के बाहर हैं और जिनके लिए अमेरिकी नियोक्ता नया वीजा आवेदन कर रहे हैं।
एक साल के लिए बढ़ा $100,000 शुल्क
ट्रंप प्रशासन ने पहली बार सितंबर 2025 में H-1B कार्यक्रम में यह 1 लाख डॉलर का भुगतान लागू किया था। नई घोषणा के तहत इस व्यवस्था को अगले 12 महीनों के लिए बढ़ाया गया है। व्हाइट हाउस का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य H-1B कार्यक्रम के दुरुपयोग को रोकना, अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि कंपनियां वास्तव में जरूरत वाले अत्यधिक कुशल विदेशी कर्मचारियों की ही भर्ती करें।
व्हाइट हाउस के अनुसार, 2025 में शुल्क लागू होने के बाद सबसे बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों द्वारा H-1B पंजीकरण में 92 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। प्रशासन इसे कार्यक्रम पर शुल्क के प्रभाव के तौर पर देख रहा है।
भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स पर क्यों पड़ेगा असर?
H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखने की अनुमति देता है। भारतीय पेशेवर लंबे समय से इस कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थी समूहों में शामिल रहे हैं। खासकर आईटी, सॉफ्टवेयर और इंजीनियरिंग क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारी H-1B व्यवस्था के जरिए अमेरिका पहुंचते हैं।
नए शुल्क के कारण अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेश से नए H-1B कर्मचारी नियुक्त करना पहले की तुलना में काफी महंगा हो सकता है। इसका असर उन भारतीय आईटी कंपनियों और पेशेवरों पर भी पड़ सकता है जिनका अमेरिकी बाजार में बड़ा कारोबार है। हालांकि, मौजूदा H-1B वीजा धारकों पर यह नया भुगतान उसी तरह लागू नहीं होता और अमेरिका में पहले से मौजूद विदेशी स्नातकों के लिए भी नियम में अलग प्रावधान हैं।
H-1B आवेदनों की जांच भी होगी सख्त
ट्रंप प्रशासन ने केवल शुल्क बढ़ाने तक ही फैसला सीमित नहीं रखा है। राष्ट्रपति ने एक अलग कार्यकारी आदेश के जरिए H-1B आवेदनों की जांच और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने का निर्देश दिया है।
अब विदेश, श्रम और होमलैंड सिक्योरिटी विभागों को आवेदन पर विचार करते समय यह भी देखना होगा कि संबंधित नियोक्ता ने हाल में उसी तरह के पदों पर अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की है या भविष्य में ऐसा करने की योजना बना रहा है। इसके लिए सरकार वेतन, उद्योग की स्थिति और नौकरी से जुड़े आंकड़ों का भी इस्तेमाल करेगी।
ट्रंप प्रशासन ने क्यों लिया यह फैसला?
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि H-1B कार्यक्रम का उद्देश्य अत्यधिक विशिष्ट कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों की जरूरत को पूरा करना था, लेकिन कुछ कंपनियों और आउटसोर्सिंग फर्मों ने इसका इस्तेमाल कम लागत वाले विदेशी श्रम के लिए किया। व्हाइट हाउस का दावा है कि इससे कुछ अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन और रोजगार के अवसर प्रभावित हुए हैं।
दूसरी ओर, H-1B व्यवस्था पर निर्भर कंपनियों का तर्क है कि यह कार्यक्रम अमेरिका में उन क्षेत्रों के लिए जरूरी है जहां विशेष कौशल वाले कर्मचारियों की कमी है। इस नीति को लेकर कानूनी विवाद भी जारी है।

ऐसे में अगले एक साल तक H-1B नियमों में सख्ती और 1 लाख डॉलर के भुगतान की व्यवस्था जारी रहने से अमेरिकी कंपनियों की विदेशी प्रतिभाओं की भर्ती रणनीति पर असर पड़ सकता है। भारतीय आईटी पेशेवरों और कंपनियों के लिए अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी प्रशासन आगे इस व्यवस्था में कोई और बदलाव करता है या नहीं।




