
नई दिल्ली: वैवाहिक बलात्कार यानी मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में शामिल करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी सवाल सामने आए। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह किसी महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपनी इच्छा से निर्णय लेने के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि मौजूदा कानून में वैवाहिक बलात्कार को लेकर एक विशेष अपवाद मौजूद है, इसलिए इस मामले में कानून और संविधान के बीच संतुलन को ध्यान में रखते हुए फैसला करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ यौन संबंध बनाए जाते हैं तो वह परिस्थितियों के अनुसार पीड़ित हो सकती है। केवल विवाह का रिश्ता होने से महिला की सहमति का महत्व समाप्त नहीं हो जाता। अदालत ने इस मामले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आपराधिक कानून और संवैधानिक अधिकारों के व्यापक संदर्भ में देखने की बात कही है।
संविधान के अनुच्छेद 21 का भी उठाया मुद्दा
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि संविधान के अलग-अलग प्रावधानों को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 20(1) किसी व्यक्ति को ऐसे कृत्य के लिए सजा दिए जाने से सुरक्षा देता है, जिसे किए जाने के समय कानून के तहत अपराध नहीं माना गया था।
अदालत ने संकेत दिया कि मैरिटल रेप के मामले में इन दोनों संवैधानिक प्रावधानों के प्रभाव को साथ रखकर विचार करना जरूरी होगा। कोर्ट यह भी देखेगा कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में वैवाहिक बलात्कार से जुड़े अपवाद की संवैधानिक स्थिति क्या है।
केंद्र सरकार ने अपराध बनाने का किया विरोध
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने वैवाहिक बलात्कार को अलग से आपराधिक अपराध बनाने की मांग का विरोध किया। उनका तर्क है कि इस तरह के गंभीर नीतिगत और आपराधिक कानून से जुड़े बदलाव का फैसला संसद और सरकार के नीतिगत क्षेत्र में आता है।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील करुणा नंदी ने दलील दी कि विवाह के आधार पर किसी पति को पत्नी की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाने के मामले में आपराधिक जिम्मेदारी से छूट नहीं दी जानी चाहिए। उनका कहना है कि विवाह किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की इच्छा और स्वायत्तता की अनदेखी करने का अधिकार नहीं देता।
कोर्ट के सामने दो बड़े कानूनी सवाल
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण सवालों पर विचार कर रहा है। पहला सवाल यह है कि अगर कानून में वैवाहिक बलात्कार से संबंधित अपवाद मौजूद रहता है तो क्या इसके बावजूद पति के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा चलाया जा सकता है। दूसरा सवाल यह है कि वैवाहिक बलात्कार को बलात्कार की कानूनी परिभाषा से बाहर रखने वाला मौजूदा अपवाद संविधान के अनुरूप है या नहीं।
अदालत ने आपराधिक मंशा यानी Mens Rea और आपराधिक जवाबदेही यानी Culpability जैसे पहलुओं पर भी विचार की जरूरत बताई। कोर्ट ने कहा कि कानून की ऐसी व्याख्या नहीं होनी चाहिए जिससे नागरिकों के लिए अप्रत्याशित कानूनी स्थिति पैदा हो।

इस मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद होगी। सुप्रीम कोर्ट के आने वाले फैसले का असर विवाह, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सहमति और आपराधिक कानून से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर पड़ सकता है।




