
भारत सरकार की अति महत्वपूर्ण और बहुप्रतीक्षित परियोजना गाजीपुर–ताड़ीघाट रेल परियोजना एक बार फिर विवादों में घिरती नजर आ रही है। वर्ष 2016 में लगभग 1600 करोड़ रुपये की लागत से गंगा नदी पर रेल पुल के साथ-साथ सह पुल का निर्माण कराया गया था। इस परियोजना को क्षेत्रीय विकास की बड़ी सौगात माना गया, लेकिन अब इसके लिए की गई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं सामने आ रही हैं।
मामला जमानिया तहसील के मेदिनीपुर मौजा से जुड़ा है, जहां भूमि चिन्हांकन में भारी खामियां पाए जाने के बाद प्रशासन हरकत में आया है।
जानकारी के अनुसार, गाजीपुर–ताड़ीघाट रेल पुल परियोजना के लिए मेदिनीपुर गांव के कुल पांच गाटा में भूमि अधिग्रहण किया गया था। जांच में यह सामने आया कि इन गाटों में सरकारी भूमि पहले से मौजूद थी, बावजूद इसके निजी काश्तकारों की भूमि को अधिग्रहित करने का प्रस्ताव भेज दिया गया।
जबकि तकनीकी रूप से इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। जांच में यह भी पता चला कि जिन आराजी संख्याओं पर निजी भूमि का अधिग्रहण दिखाया गया है, उन्हीं स्थानों पर सरकारी भूमि भी उपलब्ध थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए एडीएम वित्त एवं राजस्व दिनेश कुमार ने नाराजगी जाहिर करते हुए जमानिया तहसीलदार को पत्र जारी किया था। पत्र के माध्यम से भूमि चिन्हांकन में हुई अनियमितताओं के संबंध में विस्तृत जानकारी मांगी गई थी।
इसके बाद तहसीलदार ने तत्कालीन क्षेत्रीय राजस्व निरीक्षक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने की संस्तुति की, वहीं मामले में लापरवाही बरतने के आरोप में संबंधित लेखपाल को निलंबित कर दिया गया। इसके पश्चात पूरी रिपोर्ट संस्तुति के लिए उच्च अधिकारियों को भेज दी गई।
बताया जा रहा है कि इस अनियमितता के कारण संबंधित भूमि का मुआवजा भुगतान भी अब तक नहीं हो सका है। निजी और सरकारी भूमि की स्पष्ट पहचान न होने के चलते पूरा मामला अधर में लटका हुआ है। इससे न केवल किसानों में असंतोष है, बल्कि परियोजना से जुड़े दस्तावेजों की पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
“मेदिनीपुर गांव के पांच गाटा में भूमि अधिग्रहण से जुड़ा मामला सामने आया है। वहां प्राइवेट और सरकारी दोनों तरह की जमीन है। कुछ रकबे में अंतर पाया गया है, जिसको लेकर अभी तक भुगतान नहीं किया गया है। जॉइंट सर्वे कराया जा रहा है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जो अंतर सामने आ रहा है, वह सही है या गलत। सर्वे रिपोर्ट आने के बाद उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।”
एडीएम ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल यह चिन्हित नहीं हो पा रहा है कि कौन-सी भूमि सरकारी है और कौन-सी निजी। ऐसे में संयुक्त सर्वे रिपोर्ट के बाद ही स्थिति पूरी तरह साफ हो सकेगी और दोषियों के खिलाफ आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
अब बड़ा सवाल यह है कि 1600 करोड़ की महत्वाकांक्षी परियोजना में भूमि अधिग्रहण जैसी बुनियादी प्रक्रिया में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई?
क्या यह महज प्रशासनिक लापरवाही है या फिर इसके पीछे कोई और वजह है?
फिलहाल प्रशासनिक कार्रवाई जारी है और पूरे मामले पर जिले से लेकर शासन स्तर तक नजर बनी हुई है।




