
नई दिल्ली: भारत में मोबाइल इंटरनेट की कीमतों में पिछले एक दशक में बड़ी गिरावट आई है। वर्ष 2014 में जहां एक जीबी डेटा के लिए करीब 268 रुपये खर्च करने पड़ते थे, वहीं अब इसकी कीमत लगभग 8 रुपये बताई जा रही है। यानी प्रति जीबी डेटा की कीमत में करीब 97 प्रतिशत की कमी आई है। संचार मंत्रालय की ओर से इंडिया मोबाइल कांग्रेस (IMC) 2026 में पेश किए गए इन आंकड़ों ने देश में डिजिटल क्रांति की तस्वीर सामने रखी। हालांकि, इस बदलाव के साथ एक अहम सवाल भी खड़ा होता है कि जब इंटरनेट इतना सस्ता हो गया है, तो आखिर लोग मोबाइल पर पहले से कहीं ज्यादा समय क्यों बिता रहे हैं?
कीमत घटी, डेटा की खपत में 140 गुना उछाल
आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2014 में एक मोबाइल ग्राहक औसतन हर महीने 0.26 जीबी डेटा इस्तेमाल करता था। अब यह खपत बढ़कर करीब 36 जीबी प्रति माह हो गई है। इस तरह औसत मासिक डेटा खपत में लगभग 140 गुना वृद्धि दर्ज की गई है।
इंटरनेट की कम कीमत ने ऑनलाइन सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। आज डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शिक्षा, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, टेलीमेडिसिन और छोटे कारोबार से जुड़ी गतिविधियों के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। गांवों से लेकर शहरों तक डिजिटल सेवाओं पर निर्भरता बढ़ना इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
सस्ता डेटा, लेकिन जेब पर कितना असर?
प्रति जीबी डेटा की कीमत कम होने के बावजूद कुल मासिक खर्च का सवाल भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर एक मोटा अनुमान लगाएं तो 2014 में 0.26 जीबी डेटा की खपत और 268 रुपये प्रति जीबी की कीमत के हिसाब से मासिक खर्च करीब 70 रुपये बैठता है। वहीं, वर्तमान में 36 जीबी डेटा और 8 रुपये प्रति जीबी की दर से यह राशि लगभग 288 रुपये होती है।
हालांकि, यह केवल गणितीय अनुमान है। वास्तविक खर्च मोबाइल रिचार्ज प्लान, कॉलिंग सुविधाओं, डेटा सीमा और अन्य सेवाओं पर निर्भर करता है। इसलिए इन आंकड़ों को हर ग्राहक के वास्तविक खर्च का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। फिर भी यह गणना बताती है कि डेटा सस्ता होने के साथ उसका इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है।
मोबाइल पर रोजाना 4.9 घंटे बिता रहे भारतीय
अब सवाल है कि इतनी बड़ी मात्रा में डेटा आखिर इस्तेमाल कहां हो रहा है? इसी विषय पर बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) के एक अध्ययन का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 1,100 से अधिक लोगों के 30 दिनों के फोन डेटा के विश्लेषण में भारतीयों के औसत दैनिक फोन इस्तेमाल का समय करीब 4.9 घंटे सामने आया। पहले यह समय लगभग दो घंटे बताया गया था।
अध्ययन के मुताबिक, करीब 84 प्रतिशत लोग जागने के 15 मिनट के भीतर अपना फोन देख लेते हैं। इससे पता चलता है कि मोबाइल अब केवल बातचीत या जरूरी काम का साधन नहीं रह गया है, बल्कि दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
अध्ययन का एक और उल्लेखनीय निष्कर्ष यह है कि लगभग आधे फोन उठाने के मौकों के पीछे कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं पाया गया। यानी कई बार लोग किसी जरूरी संदेश, काम या सूचना के लिए नहीं, बल्कि आदतन अपना फोन खोल लेते हैं।
वीडियो और अंतहीन स्क्रॉलिंग बढ़ा रहे इस्तेमाल
मोबाइल डेटा की बढ़ती खपत में वीडियो स्ट्रीमिंग की भी बड़ी भूमिका है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, फोन पर बिताए जाने वाले समय का आधे से अधिक हिस्सा स्ट्रीमिंग में जाता है। वहीं, एरिक्सन की जून 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक मोबाइल डेटा ट्रैफिक में वीडियो की हिस्सेदारी करीब 75 प्रतिशत है।
रील्स, छोटे वीडियो, वेब सीरीज और लगातार अपडेट होने वाली खबरें लोगों को लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रख सकती हैं। एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा वीडियो सामने आ जाता है। इसी तरह सोशल मीडिया पर बिना किसी तय उद्देश्य के लगातार सामग्री देखते रहने की आदत को डूमस्क्रॉलिंग भी कहा जाता है।
क्या मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल भीतर के अधूरेपन का संकेत है?
मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत को केवल अच्छी या बुरी आदत के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे जरूरत, काम, मनोरंजन, जिज्ञासा और सामाजिक संपर्क जैसे कई कारण हो सकते हैं। लेकिन जब कोई व्यक्ति बार-बार बिना किसी स्पष्ट जरूरत के फोन उठाता है, तो यह समझना जरूरी हो जाता है कि ऐसा क्यों हो रहा है।
कभी काम के बहाने, कभी खबरें देखने के लिए और कभी मनोरंजन की तलाश में व्यक्ति फोन खोलता है। कई बार यह व्यवहार केवल आदत का परिणाम होता है। कुछ स्थितियों में लोग बोरियत, तनाव या अकेलेपन से ध्यान हटाने के लिए भी स्क्रीन का सहारा लेते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति के मोबाइल इस्तेमाल को मानसिक अधूरेपन से जोड़ना सही नहीं होगा।
असली सवाल यह है कि क्या व्यक्ति फोन का इस्तेमाल अपनी जरूरत के अनुसार कर रहा है, या हर खाली पल में अनजाने ही उसकी उंगलियां स्क्रीन की ओर बढ़ जाती हैं?
ऐसे में केवल ऐप हटाना या स्क्रीन टाइम कम करने का लक्ष्य तय करना पर्याप्त नहीं हो सकता। यह समझना भी जरूरी है कि फोन उठाने की इच्छा कब पैदा होती है और उस समय व्यक्ति क्या महसूस कर रहा होता है।
इंटरनेट का सस्ता होना डिजिटल विकास की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब तकनीक पर हमारी निर्भरता हमारी जरूरतों के अनुरूप रहे। सवाल सिर्फ यह नहीं कि हम हर महीने 36 जीबी डेटा क्यों खर्च कर रहे हैं, बल्कि यह भी है कि उस डेटा का कितना हिस्सा हमारे जीवन को बेहतर बना रहा है और कितना केवल हमारा समय ले रहा है।

संपादकीय नोट: प्रकाशन से पहले IMC 2026, BCG अध्ययन और एरिक्सन की जून 2026 रिपोर्ट के मूल स्रोतों से आंकड़ों की पुष्टि कर लें।



