
नई दिल्ली: यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई तेज होने के बीच पाकिस्तान की भूमिका एक बार फिर चर्चा में है। करीब 11 साल पहले यानी 2015 में जब सऊदी अरब ने यमन में हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था, तब पाकिस्तान ने सीधे युद्ध में शामिल होने से दूरी बना ली थी। अब 2026 में हालात काफी बदल चुके हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए नए रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान ने सऊदी अरब को सैन्य सहायता देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तानी सेना सीधे यमन में जाकर हूतियों के खिलाफ जमीनी लड़ाई लड़ेगी या उसकी भूमिका मुख्य रूप से सऊदी क्षेत्र की सुरक्षा और सहायक सैन्य अभियानों तक सीमित रहेगी।
2015 में पाकिस्तान ने क्यों नहीं भेजी थी सेना?
2015 में सऊदी अरब ने यमन के गृहयुद्ध में हूती विद्रोहियों के खिलाफ अरब गठबंधन का नेतृत्व किया था। उस समय रियाद ने पाकिस्तान से लड़ाकू विमान, युद्धपोत और जमीनी सैनिक उपलब्ध कराने की मांग की थी। पाकिस्तान की संसद में इस मुद्दे पर चर्चा हुई, लेकिन अंततः इस्लामाबाद ने सीधे सैन्य अभियान का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया। पाकिस्तान ने सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा की रक्षा का आश्वासन जरूर दिया था, लेकिन यमन के भीतर सैन्य कार्रवाई से दूरी बनाए रखी।
इस फैसले के पीछे पाकिस्तान के लिए कई रणनीतिक चुनौतियां थीं। एक तरफ सऊदी अरब उसका पुराना सहयोगी था, वहीं दूसरी ओर यमन संघर्ष में ईरान का प्रभाव भी महत्वपूर्ण था और ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है। इसके अलावा पाकिस्तान के भीतर भी इस संघर्ष को लेकर सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका थी।
2026 में क्यों बदले हालात?
अब परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं। अगस्त 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने सामूहिक रक्षा समझौता किया। इस समझौते के तहत किसी सदस्य देश पर हमला होने को साझा सुरक्षा के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता है। अक्टूबर की शुरुआत में सऊदी अरब पर हूतियों के हमले बढ़ने के बाद तीनों देशों ने समझौते को सक्रिय करने की दिशा में कदम उठाया।
5 अक्टूबर की बैठक के बाद पाकिस्तान और तुर्किये की सैन्य क्षमताओं को सऊदी अरब में तेजी से तैनात करने की बात सामने आई। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी संकेत दिया कि पाकिस्तानी और तुर्की सेनाएं फिलहाल सहायक भूमिका में हैं, जबकि प्रत्यक्ष लड़ाकू अभियान सऊदी सेना चला रही है।
क्या पाकिस्तान हूतियों को हरा सकता है?
यही सबसे बड़ा सवाल है। पाकिस्तान की सैन्य क्षमता मजबूत है, लेकिन यमन में हूतियों के खिलाफ निर्णायक जीत केवल सैनिकों की संख्या या हथियारों से हासिल करना आसान नहीं होगा। हूती संगठन लंबे समय से यमन के पहाड़ी और कठिन इलाकों में लड़ रहा है। उसके पास ड्रोन और मिसाइलों के साथ असममित युद्ध का व्यापक अनुभव है।
सऊदी नेतृत्व वाली नई कार्रवाई का लक्ष्य लाल सागर और रणनीतिक बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास नियंत्रण मजबूत करना है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। रिपोर्टों के अनुसार सऊदी समर्थित यमनी बलों ने कुछ इलाकों में बढ़त बनाई है, जबकि हूतियों ने सऊदी क्षेत्र में ड्रोन और मिसाइल हमलों के जरिए जवाब दिया है।
पाकिस्तान की भूमिका सीधे युद्ध से ज्यादा रणनीतिक हो सकती है
मौजूदा संकेतों से लगता है कि पाकिस्तान की प्राथमिक भूमिका सऊदी अरब की रक्षा मजबूत करने, निगरानी, प्रशिक्षण, खुफिया सहयोग और एयर डिफेंस जैसे क्षेत्रों में हो सकती है। रॉयटर्स के अनुसार पाकिस्तान ने सऊदी अरब को सैन्य उपकरण और एयर डिफेंस से जुड़ी सहायता भी उपलब्ध कराई है, जबकि पाकिस्तानी सैन्य सलाहकार सऊदी पक्ष के साथ काम कर रहे हैं।
ऐसे में पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की है। वह सऊदी अरब का रक्षा सहयोगी है, लेकिन ईरान के साथ भी उसे संबंध संभालने हैं। सीधे यमन युद्ध में उतरने से क्षेत्रीय तनाव और बढ़ सकता है।
क्या बदलेगा युद्ध का समीकरण?
पाकिस्तान की भागीदारी से सऊदी अरब को निश्चित तौर पर अतिरिक्त सैन्य क्षमता, विशेषज्ञता और रक्षा समर्थन मिल सकता है। लेकिन हूतियों को पूरी तरह पराजित करना अभी भी कठिन लक्ष्य है। यमन में स्थानीय ताकतों के बीच मतभेद, हूतियों की जमीनी पकड़ और लाल सागर की रणनीतिक स्थिति इस संघर्ष को जटिल बनाती है।

इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान के शामिल होने से हूतियों की हार तय है। इतना जरूर है कि 2015 में सीधे युद्ध से दूरी बनाने वाले पाकिस्तान की भूमिका 2026 में पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय और रणनीतिक हो गई है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि इस्लामाबाद केवल सऊदी अरब की रक्षा तक सीमित रहता है या हूतियों के खिलाफ अभियान में उसकी भूमिका और आगे बढ़ती है।




