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Property Eviction : किराया कानून बिना संपत्ति खाली करा सकता है परिसमापक, एनसीएलएटी ने आदेश रखा बरकरार

किराया कानून की अलग कार्रवाई के बिना भी संपत्ति खाली करा सकता है लिक्विडेटर, NCLAT ने NCLT का आदेश रखा बरकरार

राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) ने संपत्ति कब्जे से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि कंपनी के परिसमापक (Liquidator) को कॉरपोरेट देनदार की संपत्तियों पर कब्जा लेने के लिए अलग से किराया नियंत्रण कानून के तहत कार्यवाही शुरू करना जरूरी नहीं है। यदि संपत्ति कॉरपोरेट देनदार की परिसंपत्तियों का हिस्सा है, तो परिसमापक दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (IBC) के प्रावधानों के तहत सीधे उस पर कब्जा ले सकता है।

NCLAT ने लुधियाना की कंपनियों ड्यूक फैशन्स और यूवीएंडडब्ल्यू प्रोडक्ट्स की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) की चंडीगढ़ पीठ के आदेश को बरकरार रखा है। NCLT ने दोनों कंपनियों को कराबारा और हुसैनपुरा में स्थित दो व्यावसायिक संपत्तियां दो सप्ताह के भीतर खाली करने का निर्देश दिया था।

30 साल की लीज का दिया था हवाला

मामले में ड्यूक फैशन्स और यूवीएंडडब्ल्यू प्रोडक्ट्स ने NCLT के आदेश को चुनौती देते हुए दावा किया था कि उनके पास संबंधित संपत्तियों पर 30 साल की लीज डीड के आधार पर वैध किरायेदारी अधिकार हैं। कंपनियों का कहना था कि यदि उन्हें संपत्ति से बेदखल करना है तो इसके लिए 1949 के ईस्ट पंजाब अर्बन रेंट रिस्ट्रिक्शन एक्ट के तहत किराया नियंत्रक के सामने उचित कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी।

अपीलकर्ताओं ने इसी आधार पर NCLT के आदेश को चुनौती दी थी। हालांकि, NCLAT ने उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि इस मामले में परिसमापक को संपत्ति का कब्जा लेने के लिए अलग से किराया नियंत्रण कानून की प्रक्रिया में जाने की आवश्यकता नहीं है।

बिना पंजीकरण की लीज डीड पर भी उठे सवाल

NCLAT ने सुनवाई के दौरान यह भी पाया कि दोनों कंपनियों की ओर से पेश की गई लीज डीड पंजीकृत नहीं थीं। न्यायाधिकरण के मुताबिक, ऐसी स्थिति में इन दस्तावेजों को संबंधित किरायेदारी अधिकार साबित करने के लिए साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि अपील करने वाली दोनों कंपनियों के निदेशक कॉरपोरेट देनदार कंपनी के निलंबित निदेशकों के करीबी रिश्तेदार थे। न्यायाधिकरण ने मामले के तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों को देखते हुए कंपनियों के कब्जे को बनाए रखने के दावे को स्वीकार नहीं किया।

IBC के तहत परिसमापक की जिम्मेदारी क्या है?

NCLAT ने अपने फैसले में दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता यानी IBC की धारा 35 का उल्लेख किया। इस धारा के तहत परिसमापक की जिम्मेदारी होती है कि वह कॉरपोरेट देनदार की संपत्तियों और उससे जुड़े अधिकारों का नियंत्रण अपने हाथ में ले और उनका प्रबंधन करे।

न्यायाधिकरण ने माना कि परिसमापन प्रक्रिया का उद्देश्य कॉरपोरेट देनदार की संपत्तियों को सुरक्षित करना और कानून के मुताबिक उनका निपटारा करना है। ऐसे में यदि किसी संपत्ति पर तीसरे पक्ष का कब्जा है और परिसमापक को उसे अपने नियंत्रण में लेना है, तो केवल इस आधार पर प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता कि कब्जाधारी किराया नियंत्रण कानून के तहत अलग कार्यवाही की मांग कर रहा है।

दूसरे कानूनों पर IBC का प्रभाव

NCLAT ने IBC की धारा 238 का भी हवाला दिया। इस धारा के तहत IBC के प्रावधानों को अन्य कानूनों के विपरीत स्थिति में अधिभावी प्रभाव प्राप्त है। न्यायाधिकरण के इस रुख का सीधा संबंध दिवाला प्रक्रिया के दौरान कॉरपोरेट देनदार की संपत्तियों को सुरक्षित रखने और परिसमापक को अपनी वैधानिक जिम्मेदारियां निभाने में सक्षम बनाने से है।

वीनस गारमेंट्स से जुड़ा है मामला

यह पूरा विवाद वीनस गारमेंट्स (इंडिया) से संबंधित है। कंपनी को NCLT की चंडीगढ़ पीठ ने कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया यानी CIRP में लिया था। बाद में कंपनी के खिलाफ परिसमापन की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश 22 जुलाई 2025 को पारित किया गया।

परिसमापन प्रक्रिया शुरू होने के बाद कंपनी की संपत्तियों पर नियंत्रण हासिल करना परिसमापक की जिम्मेदारी बन गई। इसी क्रम में कराबारा और हुसैनपुरा स्थित व्यावसायिक संपत्तियों को खाली कराने को लेकर विवाद सामने आया।

NCLAT के इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि परिसमापन प्रक्रिया के दौरान कॉरपोरेट देनदार की संपत्तियों पर कब्जे से जुड़े मामलों में IBC के प्रावधानों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। हालांकि, हर मामले में संपत्ति के दस्तावेज, किरायेदारी की वैधता और संबंधित पक्षों के अधिकारों का परीक्षण मामले के तथ्यों के आधार पर किया जाएगा।

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