
ओटीटी की चर्चित एंथोलॉजी फ्रेंचाइजी ‘लस्ट स्टोरीज’ एक बार फिर रिश्तों की उन परतों को सामने लाती है, जिन पर आमतौर पर खुलकर बातचीत नहीं होती। ‘लस्ट स्टोरीज 3’ में प्यार, शादी, आकर्षण, शारीरिक जरूरतों और भावनात्मक दूरी जैसे विषयों को चार अलग-अलग कहानियों के जरिए दिखाया गया है। इस बार फिल्म को विक्रमादित्य मोटवाने, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज जैसे चार अलग-अलग अंदाज वाले निर्देशकों ने संभाला है। हर कहानी का माहौल, किरदार और कहानी कहने का तरीका अलग है, लेकिन सभी का केंद्र रिश्तों की जटिलता और इंसानी इच्छाएं हैं।
पहली कहानी में शादीशुदा जिंदगी की उलझन
फिल्म की शुरुआत विक्रमादित्य मोटवाने की कहानी से होती है। इसमें शोना और पद्मा उर्फ पैडी की भूमिका कोंकणा सेन शर्मा और राधिका आप्टे ने निभाई है। दोनों शादीशुदा सहेलियां हैं, लेकिन अपनी वैवाहिक जिंदगी में भावनात्मक दूरी और निजी असंतोष से गुजर रही हैं। खंडाला की यात्रा के दौरान दोनों अपने पतियों के साथ एक ऐसा खेल शुरू करती हैं, जो आगे चलकर रिश्तों की कई छिपी हुई सच्चाइयों को सामने लाता है। अभिषेक बनर्जी और विजय वर्मा भी इस कहानी का अहम हिस्सा हैं। कहानी की शुरुआत दिलचस्प है और इसमें हास्य का भी पुट है, लेकिन आगे बढ़ने के साथ इसकी पकड़ कुछ कमजोर पड़ती नजर आती है।
दूसरी कहानी में अचानक पैदा हुआ आकर्षण
किरण राव की कहानी डिलीवरी बॉय करण और नेल आर्टिस्ट लीसा के इर्द-गिर्द घूमती है। करण का किरदार गुरफतेह पीरजादा ने निभाया है, जबकि सना थंपी लीसा के रोल में नजर आती हैं। दोनों के बीच अचानक पैदा होने वाला आकर्षण कहानी को अलग दिशा देता है। गुरफतेह का डबल रोल इस हिस्से में अतिरिक्त रोमांच पैदा करता है और दर्शकों के लिए कई सवाल खड़े करता है। कहानी हल्के-फुल्के अंदाज में आगे बढ़ती है और बीच-बीच में आने वाले ट्विस्ट इसे मनोरंजक बनाए रखते हैं।
तलाक के बीच भी कायम है रिश्ता
तीसरी कहानी शकुन बत्रा की है और इसे चारों में रिश्तों की भावनात्मक जटिलता को सबसे सीधे तरीके से छूने वाली कहानी कहा जा सकता है। वरुण और सायली की शादी को दो साल हो चुके हैं, लेकिन अब दोनों तलाक की दहलीज पर हैं। अली फजल और राधिका मदान ने इन किरदारों को निभाया है। दोनों के बीच बातचीत लगभग खत्म हो चुकी है और रिश्ते में नाराजगी, असुरक्षा और तनाव बढ़ चुका है। इसके बावजूद दोनों का शारीरिक जुड़ाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। थेरेपी के दौरान फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या सिर्फ आकर्षण किसी टूटते रिश्ते को बचा सकता है या फिर यह कुछ समय के लिए दर्द को भुलाने का जरिया भर है।
आखिरी कहानी में साहित्य और कल्पना का संसार
विशाल भारद्वाज की कहानी दर्शकों को 80 के दशक के हैदराबाद में लेकर जाती है। यहां अदिति राव हैदरी की सायरा अपने पति बदरू के साथ रहती है, लेकिन उसके भीतर कई ऐसी इच्छाएं हैं जिन्हें वह खुलकर व्यक्त नहीं कर पाती। सिद्धार्थ ने बदरू की भूमिका निभाई है। सायरा साहित्य, किताबों और कल्पनाओं के सहारे अपनी भावनात्मक दुनिया को समझने की कोशिश करती है। मंटो को पढ़ने वाली सायरा की कल्पनाएं धीरे-धीरे उसके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती हैं। विशाल भारद्वाज ने इस कहानी को साहित्यिक और शायराना अंदाज में पेश किया है।
कलाकारों ने संभाली कहानी की कमान
अभिनय के स्तर पर फिल्म का प्रदर्शन मजबूत नजर आता है। कोंकणा सेन शर्मा अपने सहज अभिनय से प्रभावित करती हैं, जबकि राधिका आप्टे अपने एक्सप्रेशंस और कॉमिक टाइमिंग से पहले हिस्से को रोचक बनाती हैं। विजय वर्मा और अभिषेक बनर्जी भी अपनी भूमिकाओं में प्रभाव छोड़ते हैं। दूसरी कहानी में गुरफतेह पीरजादा का डबल रोल ध्यान खींचता है और सना थंपी ने भी अपने किरदार को आत्मविश्वास के साथ निभाया है।
तीसरी कहानी में अली फजल और राधिका मदान के बीच की केमिस्ट्री खास नजर आती है। दोनों ने रिश्ते में मौजूद गुस्सा, प्यार, असुरक्षा और टूटन को सहजता से पेश किया है। वहीं अदिति राव हैदरी और सिद्धार्थ आखिरी कहानी में अलग तरह की ऊर्जा लेकर आते हैं। अदिति ने सायरा की भावनात्मक उथल-पुथल और कल्पनाशीलता को खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है।
चार निर्देशकों की चार अलग शैली
‘लस्ट स्टोरीज 3’ की सबसे खास बात इसका एंथोलॉजी फॉर्मेट है। चारों निर्देशकों ने एक ही विषय को अपने-अपने नजरिए से प्रस्तुत किया है। मोटवाने की कहानी वैवाहिक अकेलेपन पर केंद्रित है, किरण राव का हिस्सा मनोरंजन और ट्विस्ट के जरिए आगे बढ़ता है, जबकि शकुन बत्रा रिश्तों में संवाद की कमी और भावनात्मक दूरी को ज्यादा गहराई से देखते हैं। विशाल भारद्वाज की कहानी साहित्य, कल्पना और दबे हुए अरमानों को खूबसूरत सिनेमाई अंदाज में सामने रखती है।
कुल मिलाकर ‘लस्ट स्टोरीज 3’ रिश्तों को किसी एक नजरिए से देखने के बजाय उनकी अलग-अलग जटिलताओं को सामने रखने की कोशिश करती है। चारों कहानियों की ताकत और असर एक जैसा नहीं है, लेकिन कलाकारों का अभिनय और निर्देशकों की अलग-अलग शैली इसे एक विविध अनुभव बनाती है।




