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Consumer Court : ग्राहक के खाते से कटे पैसे लौटाने का एसबीआई को उपभोक्ता आयोग ने दिया आदेश

Consumer Court: खाते से कटे ₹1.64 लाख लौटाने होंगे, SBI को ₹1.89 लाख चुकाने का आदेश, जानें पूरा मामला

Consumer Court: पंजाब के एक उपभोक्ता आयोग (कंज्यूमर कोर्ट) ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को एक ग्राहक को बड़ी राहत देते हुए उसके खाते से अनधिकृत तरीके से निकाली गई ₹1.64 लाख की राशि वापस करने का आदेश दिया है। आयोग ने सिर्फ मूल रकम लौटाने का ही निर्देश नहीं दिया, बल्कि मानसिक उत्पीड़न के लिए ₹15,000 और मुकदमेबाजी के खर्च के लिए ₹10,000 भी देने को कहा है। इस तरह बैंक को कुल ₹1.89 लाख का भुगतान करना होगा। आयोग ने अपने फैसले में कहा कि समय पर शिकायत मिलने के बावजूद बैंक निष्पक्ष और ठोस जांच करने में विफल रहा, जो सेवा में कमी (Deficiency in Service) माना जाएगा।

क्या है पूरा मामला?

शिकायतकर्ता के अनुसार उसके बैंक खाते से ₹1.64 लाख की अनधिकृत ऑनलाइन बैंकिंग ट्रांजैक्शन हुई। जैसे ही उसे इस लेन-देन की जानकारी मिली, उसने बिना देरी किए अपनी बैंक शाखा, SBI की हेल्पलाइन, नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल और स्थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। ग्राहक का कहना था कि उसने समय रहते सभी आवश्यक कदम उठाए, लेकिन इसके बावजूद बैंक ने उसकी राशि वापस नहीं की।

जब बैंक स्तर पर समाधान नहीं मिला तो ग्राहक ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण किया।

ग्राहक ने क्या लगाए आरोप?

शिकायतकर्ता ने आयोग को बताया कि उसने कभी भी अपना ATM PIN, OTP, इंटरनेट बैंकिंग यूजर आईडी, पासवर्ड या कोई अन्य गोपनीय जानकारी किसी के साथ साझा नहीं की। इसके बावजूद उसके खाते से बड़ी रकम निकाल ली गई।

ग्राहक ने यह भी आरोप लगाया कि बैंक ने उसकी शिकायत की निष्पक्ष जांच नहीं की। उसके अनुसार बैंक ने बिना किसी विस्तृत तकनीकी जांच रिपोर्ट या ठोस इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के उसका दावा खारिज कर दिया। ग्राहक का कहना था कि बैंक ने केवल सामान्य दलीलों के आधार पर उसे जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की।

SBI ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान SBI ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि संबंधित ऑनलाइन ट्रांजैक्शन यूजरनेम, पासवर्ड और रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजे गए OTP के बिना संभव नहीं था। बैंक का तर्क था कि ऐसी स्थिति में ग्राहक की ओर से किसी प्रकार की लापरवाही हुई हो सकती है, जिसके कारण धोखाधड़ी संभव हुई।

हालांकि बैंक ग्राहक की कथित लापरवाही साबित करने के लिए कोई विस्तृत तकनीकी रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं कर सका।

आयोग ने किन आधारों पर सुनाया फैसला?

उपभोक्ता आयोग ने पाया कि SBI ग्राहक की लापरवाही साबित करने के लिए सर्वर लॉग, IP एड्रेस, फोरेंसिक जांच रिपोर्ट, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड या अन्य तकनीकी साक्ष्य पेश नहीं कर सका। आयोग ने कहा कि केवल अनुमान के आधार पर ग्राहक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

आयोग ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 6 जुलाई 2017 के दिशानिर्देशों का भी हवाला दिया। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार यदि कोई ग्राहक अनधिकृत लेन-देन की समय पर सूचना देता है, तो यह साबित करने की जिम्मेदारी बैंक की होती है कि ग्राहक की लापरवाही के कारण ही नुकसान हुआ।

आयोग ने कहा कि इस मामले में बैंक अपने दावे को तकनीकी और कानूनी साक्ष्यों से साबित नहीं कर पाया। इसलिए बैंक का पक्ष केवल अनुमान पर आधारित माना गया।

आयोग ने SBI को क्या आदेश दिए?

उपभोक्ता आयोग ने शिकायत स्वीकार करते हुए SBI को निम्नलिखित निर्देश दिए—

  • ग्राहक को ₹1.64 लाख की पूरी राशि वापस लौटाई जाए।
  • मानसिक उत्पीड़न और असुविधा के लिए ₹15,000 मुआवजा दिया जाए।
  • मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में ₹10,000 का भुगतान किया जाए।

यानी बैंक को कुल ₹1.89 लाख ग्राहक को देने होंगे।

फैसले में आयोग ने क्या कहा?

अपने आदेश में आयोग ने स्पष्ट किया कि जब कोई ग्राहक अनधिकृत बैंकिंग लेन-देन की तुरंत सूचना देता है, तो बैंक की जिम्मेदारी होती है कि वह मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और विस्तृत तकनीकी जांच करे। यदि बैंक ऐसा करने में विफल रहता है और बिना पर्याप्त साक्ष्यों के ग्राहक का दावा खारिज कर देता है, तो इसे सेवा में कमी माना जाएगा और उपभोक्ता को राहत देने का अधिकार आयोग के पास है।

ग्राहकों के लिए क्या है संदेश?

यह फैसला उन बैंक ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो साइबर धोखाधड़ी या अनधिकृत ऑनलाइन बैंकिंग ट्रांजैक्शन का शिकार होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाते से बिना अनुमति के कोई लेन-देन हो जाए तो ग्राहक को तुरंत बैंक, साइबर क्राइम पोर्टल और पुलिस को सूचना देनी चाहिए। समय पर शिकायत दर्ज कराने से जांच में मदद मिलती है और कानून के तहत उपभोक्ता को राहत मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है। यह फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि केवल संदेह के आधार पर ग्राहक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि बैंक को अपनी बात तकनीकी और कानूनी साक्ष्यों के साथ साबित करनी होगी।

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