देश इस समय भीषण गर्मी की मार झेल रहा है। उत्तर भारत से लेकर मध्य और पश्चिम भारत तक कई राज्यों में तापमान सामान्य से 3 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक रिकॉर्ड किया जा रहा है। दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और बिहार समेत कई इलाकों में दोपहर के समय सड़कें सूनी दिखाई दे रही हैं। लगातार बढ़ती गर्मी और लू ने आम जनजीवन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। मौसम विभाग के अनुसार आने वाले दिनों में राहत की संभावना कम है और अल-नीनो की सक्रियता के कारण स्थिति और गंभीर हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब गर्मी केवल एक मौसमी परेशानी नहीं रह गई, बल्कि यह एक बड़ा पर्यावरणीय और आर्थिक संकट बनती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट्स लगातार चेतावनी दे रही हैं कि भारत में हीटवेव के दिनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसका असर लोगों के स्वास्थ्य, कामकाज, कृषि और देश की अर्थव्यवस्था तक पर साफ दिखाई देने लगा है।

लगातार बढ़ रहे लू के दिन
हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस साल 27 अप्रैल और 19 मई ऐसे दिन रहे, जब दुनिया के सबसे ज्यादा गर्म 50 शहरों में सभी शहर भारत के थे। यह आंकड़ा देश में बढ़ती गर्मी की गंभीरता को दर्शाता है। WHO की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 50 प्रतिशत से अधिक शहर अब “अधिक” से लेकर “बेहद अधिक” हीट रिस्क की श्रेणी में पहुंच चुके हैं।
बीते कुछ वर्षों में लू वाले दिनों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। वर्ष 2015 से 2020 के बीच औसतन हीटवेव वाले दिनों की संख्या 7.4 दिन से बढ़कर 32.2 दिन तक पहुंच गई। विशेषज्ञों का कहना है कि क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग के कारण आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। बढ़ता तापमान अब केवल दिन के समय ही नहीं, बल्कि रातों में भी महसूस किया जा रहा है।
रातों की गर्मी ने बढ़ाई चिंता
भारत के बड़े शहरों में अब रातें भी राहत नहीं दे रही हैं। हाल ही में दिल्ली ने मई महीने की 13 वर्षों की सबसे गर्म रात दर्ज की, जहां न्यूनतम तापमान सामान्य से 5.2 डिग्री सेल्सियस ऊपर रहा। पहले जहां रात के समय तापमान गिरने से लोगों को कुछ राहत मिलती थी, अब वह स्थिति भी बदल रही है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि लगातार गर्म रहने वाली रातें स्वास्थ्य के लिए ज्यादा खतरनाक होती हैं क्योंकि शरीर को रिकवरी का समय नहीं मिल पाता। इससे हीट स्ट्रेस, डिहाइड्रेशन, हार्ट डिजीज और नींद से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं। बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है।
शहरों में ‘अर्बन हीट आईलैंड’ का खतरा
देश के बड़े शहरों में गर्मी की स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है। इसका बड़ा कारण “अर्बन हीट आईलैंड इफेक्ट” माना जा रहा है। तेजी से बढ़ते कंक्रीट के निर्माण, हरियाली में कमी, वाहनों की संख्या और प्रदूषण के कारण शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक हो जाता है।
दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना और अहमदाबाद जैसे शहरों में गर्मी का असर सबसे ज्यादा महसूस किया जा रहा है। सड़कों, इमारतों और सीमेंटेड क्षेत्रों में दिनभर जमा हुई गर्मी रात में भी वातावरण को ठंडा नहीं होने देती। यही कारण है कि शहरी क्षेत्रों में हीटवेव का प्रभाव लगातार खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि शहरों में हरित क्षेत्र नहीं बढ़ाए गए और प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है।
स्वास्थ्य पर गंभीर असर
भीषण गर्मी का सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है। नैशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) के अनुसार वर्ष 2025 में हीट स्ट्रोक के सात हजार से अधिक संदिग्ध मामले सामने आए थे। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक हो सकता है, क्योंकि देश में हीट स्ट्रोक से जुड़ी कई घटनाएं रिपोर्ट ही नहीं हो पातीं।
अस्पतालों में डिहाइड्रेशन, चक्कर आना, उल्टी, थकान और हीट स्ट्रोक के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। डॉक्टरों का कहना है कि दोपहर के समय बाहर निकलना खतरनाक साबित हो सकता है। लगातार तेज धूप में रहने से शरीर का तापमान तेजी से बढ़ता है, जिससे कई बार जान का खतरा भी पैदा हो जाता है।
विशेषज्ञ लोगों को पर्याप्त पानी पीने, हल्के कपड़े पहनने और दोपहर 12 बजे से 4 बजे के बीच धूप से बचने की सलाह दे रहे हैं।
मजदूर और गिग वर्कर्स सबसे ज्यादा प्रभावित
देश की एक बड़ी आबादी ऐसी है जो खुले आसमान के नीचे काम करने को मजबूर है। इनमें दिहाड़ी मजदूर, निर्माण कार्य में लगे कर्मचारी, डिलीवरी बॉय, रिक्शा चालक, स्ट्रीट वेंडर्स और गिग वर्कर्स शामिल हैं। भीषण गर्मी का सबसे ज्यादा असर इन्हीं लोगों पर पड़ रहा है।
इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि काम बंद करने का मतलब आय बंद होना है। गर्मी में लंबे समय तक काम करने से हीट स्ट्रेस और डिहाइड्रेशन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। कई बार मजदूर बेहोश होकर गिर पड़ते हैं, जबकि कुछ मामलों में मौत तक हो जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन को सार्वजनिक शेल्टर, मुफ्त पेयजल, कूलिंग सेंटर और प्राथमिक चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था करनी चाहिए। जहां संभव हो, वहां काम के घंटों में बदलाव भी किया जा सकता है ताकि लोग दोपहर की तेज धूप से बच सकें।
अर्थव्यवस्था पर भी बढ़ रहा दबाव
गर्मी केवल स्वास्थ्य संकट नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है। अत्यधिक तापमान के कारण काम के घंटे कम हो जाते हैं और उत्पादकता घटती है। इसका असर उद्योग, निर्माण, कृषि और सेवा क्षेत्र पर पड़ रहा है।
McKinsey Global Institute की एक रिपोर्ट के अनुसार यदि यही स्थिति जारी रही तो वर्ष 2030 तक अत्यधिक गर्मी के कारण भारत की GDP का लगभग 4.5 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हो सकता है। कृषि उत्पादन में गिरावट, बिजली की बढ़ती मांग और स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता दबाव आर्थिक नुकसान को और बढ़ा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार क्लाइमेट चेंज और अल-नीनो के संयुक्त प्रभाव से मानसून भी कमजोर पड़ सकता है, जिससे सूखे और जल संकट जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
समय रहते तैयारी जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि अब केवल चेतावनी देने से काम नहीं चलेगा। सरकार, प्रशासन और समाज को मिलकर दीर्घकालिक रणनीति तैयार करनी होगी। शहरों में हरियाली बढ़ाने, जल संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और हीट एक्शन प्लान को मजबूत करने की जरूरत है।
जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट बन चुका है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में भारत को भीषण गर्मी, जल संकट और आर्थिक नुकसान जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
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