जहां एक ओर देश के कई हिस्सों में एलपीजी सिलेंडर की किल्लत और बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की परेशानी बढ़ा दी है, वहीं औरैया जनपद का एक छोटा सा गांव आज आत्मनिर्भरता की मिसाल बनकर उभर रहा है। भाग्यनगर ब्लॉक का परवाहा गांव पिछले एक दशक से गोबर गैस संयंत्रों के जरिए न सिर्फ अपनी रसोई चला रहा है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और खेती की लागत कम करने की दिशा में भी एक सफल मॉडल पेश कर रहा है।
देशभर में इन दिनों घरेलू एलपीजी गैस सिलेंडर को लेकर उपभोक्ताओं को लंबी कतारों और आपूर्ति की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कई जगहों पर सिलेंडर समय पर नहीं मिल पा रहे, तो कहीं उनकी बढ़ती कीमतें लोगों के बजट पर भारी पड़ रही हैं। लेकिन इन सबके बीच औरैया जिले के भाग्यनगर ब्लॉक का परवाहा गांव इन समस्याओं से पूरी तरह अछूता नजर आता है।
यह गांव पिछले लगभग 10 वर्षों से गोबर गैस संयंत्रों का उपयोग कर रहा है। यहां के ग्रामीणों ने पारंपरिक ईंधन और एलपीजी पर निर्भरता कम कर स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा का रास्ता अपनाया है।
परवाहा गांव में करीब 60 परिवार निवास करते हैं, जिनमें से 30 से अधिक घरों में गोबर गैस संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं। गांव के अधिकांश लोग पशुपालन से जुड़े हुए हैं और उनके पास पर्याप्त संख्या में मवेशी हैं। इन्हीं मवेशियों से प्राप्त गोबर को संसाधन बनाकर ग्रामीण ऊर्जा का उत्पादन कर रहे हैं।
गांव में कई घरों के बाहर गोबर गैस संयंत्र बनाए गए हैं, जिनसे पाइपलाइन के जरिए सीधे रसोई तक गैस पहुंचती है। ग्रामीण गोबर में पानी मिलाकर संयंत्र में डालते हैं, जिससे जैविक प्रक्रिया के तहत गैस तैयार होती है। यह गैस सुबह-शाम भोजन पकाने के लिए पर्याप्त होती है। इससे न तो लकड़ी जलाने की जरूरत पड़ती है और न ही एलपीजी सिलेंडर पर निर्भर रहना पड़ता है।
गोबर गैस संयंत्रों का लाभ केवल रसोई तक सीमित नहीं है। इन संयंत्रों से निकलने वाला अवशेष (स्लरी) उच्च गुणवत्ता की जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जाता है। किसान इस खाद को अपने खेतों में डालते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर होने वाला खर्च कम हो जाता है।
इसके साथ ही, यह जैविक खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी मददगार साबित हो रही है। इससे फसलों की गुणवत्ता बेहतर हो रही है और उत्पादन में भी वृद्धि देखी जा रही है। इस प्रकार गोबर गैस संयंत्र ग्रामीणों के लिए दोहरा लाभ प्रदान कर रहे हैं—ऊर्जा की बचत और खेती की लागत में कमी।
जब देश के कई हिस्सों में गैस सिलेंडर को लेकर अफरातफरी का माहौल है, तब परवाहा गांव के लोग खुद को पूरी तरह निश्चिंत महसूस कर रहे हैं। उन्हें न तो सिलेंडर बुक कराने की चिंता है और न ही उसकी कीमतों में बढ़ोतरी का डर।
हालांकि, इस व्यवस्था के बावजूद ग्रामीणों को कुछ समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। गोबर गैस संयंत्रों के रखरखाव के लिए जरूरी पार्ट्स और उपकरण आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाते। इससे समय-समय पर संयंत्रों की मरम्मत में दिक्कत आती है।
गांव के लोगों ने सरकार से मांग की है कि गोबर गैस संयंत्रों से जुड़े उपकरणों और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता को आसान बनाया जाए। यदि यह सुविधा सुगम हो जाए, तो अधिक से अधिक लोग इस स्वच्छ ऊर्जा विकल्प को अपनाने के लिए प्रेरित होंगे।
परवाहा गांव आज ग्रामीण भारत के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन चुका है। यह गांव न केवल ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। यदि ऐसे मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए, तो यह देश की ऊर्जा समस्याओं के समाधान में एक अहम भूमिका निभा सकता है।
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