
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज करा रहे मरीजों और उनके परिवारों पर महंगे इलाज का बोझ कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों और निजी अस्पतालों के भारी मार्जिन पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने पूछा कि जब किसी दवा को कम कीमत पर खरीदा जा सकता है, तो मरीज से उसके लिए कई गुना अधिक रकम क्यों वसूली जाती है। अदालत ने केंद्र सरकार से भी दवाओं के व्यापारिक मार्जिन को नियंत्रित करने के कदमों पर जवाब मांगा।
दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने निजी अस्पतालों में दवाओं और मेडिकल सामान की कीमतों में बड़े अंतर पर चिंता जताई। सुनवाई के दौरान एक उदाहरण का जिक्र किया गया, जिसमें कैंसर के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाले एक इंजेक्शन की कीमत दवा विक्रेता के लिए लगभग 11,000 रुपये बताई गई, जबकि अस्पताल में उसी इंजेक्शन के लिए करीब 1.30 लाख रुपये वसूले जाने की बात सामने आई।
अदालत ने सवाल किया कि आखिर दवा की खरीद कीमत और मरीज से लिए जाने वाले पैसे के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है। पीठ ने स्पष्ट किया कि अस्पतालों को अपने खर्च चलाने और सेवाओं के लिए उचित शुल्क लेने का अधिकार है, लेकिन दवाओं की कीमतों में अत्यधिक बढ़ोतरी को केवल कारोबारी जरूरतों के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता।
केंद्र सरकार से पूछा- कैंसर की दवाओं पर ही सीमा क्यों?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस कदम पर भी सवाल उठाए, जिसके तहत चुनिंदा कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत तक सीमित करने का फैसला किया गया है। अदालत जानना चाहती थी कि सरकार ने इस दिशा में कदम उठाने में इतना समय क्यों लगाया और इसी तरह का नियमन दूसरी दवाओं पर लागू करने की संभावना पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा कि दवाओं की कीमतों का मामला केवल व्यापार या आर्थिक नीति तक सीमित नहीं है, क्योंकि इसका सीधा संबंध मरीजों की जिंदगी और इलाज तक उनकी पहुंच से है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या सभी दवाओं पर एक समान मार्जिन की सीमा तय करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है।
137 कैंसर दवाओं की कीमतों में कमी की तैयारी
इस बीच केंद्र सरकार ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 137 गैर-अनुसूचित दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित करने की अधिसूचना जारी की है। सरकार के मुताबिक, इस फैसले से संबंधित दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) में दवा के मौजूदा मूल्य ढांचे के आधार पर 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।
सरकार ने बताया है कि संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से लागू होंगी। इसका उद्देश्य कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाओं को मरीजों के लिए अधिक किफायती बनाना और दवा वितरण व्यवस्था में अत्यधिक मार्जिन पर अंकुश लगाना है। हालांकि, वास्तविक बचत दवा के प्रकार और उसकी मौजूदा कीमत पर निर्भर करेगी।
निजी अस्पतालों ने क्या दलील दी?
अदालत में निजी अस्पतालों की ओर से दलील दी गई कि अस्पतालों को दवाओं की गुणवत्ता और उपलब्धता सुनिश्चित करनी होती है। इसके अलावा, उन्हें चौबीसों घंटे चिकित्सा सुविधाएं, जरूरी उपकरण और प्रशिक्षित कर्मचारियों की व्यवस्था बनाए रखनी पड़ती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि अस्पताल अपने संचालन का खर्च उचित सेवाशुल्क के जरिए वसूल सकते हैं, लेकिन दवाओं पर असाधारण रूप से अधिक कीमत वसूलने को जायज नहीं ठहराया जा सकता।

अब फैसले पर सबकी नजर
सुप्रीम कोर्ट दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण, ट्रेड मार्जिन और मरीजों को जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराने जैसे मुद्दों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। 27 अक्टूबर को पीठ ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया और संबंधित पक्षों से लिखित दलीलें दाखिल करने को कहा।
इस मामले का फैसला दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने की व्यवस्था और मरीजों के इलाज के खर्च पर महत्वपूर्ण असर डाल सकता है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में लंबे समय तक इलाज की जरूरत पड़ने पर दवाओं का खर्च परिवारों के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बन जाता है। ऐसे में मरीजों को उचित कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने और उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाना सरकार और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए अहम होगा।




