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शालिग्राम और तुलसी विवाह का धार्मिक महत्व क्या है?

सनातन धर्म में शालिग्राम जी को भगवान विष्णु का ही दिव्य स्वरूप माना जाता है। जिनकी तुलसी विवाह के दिन तुलसी के पौधे के साथ शादी करवाई जाती है। लेकिन कौन हैं शालिग्राम भगवान? क्यों हर साल इनका कराया जाता है विवाह? यहां हम आपको इसी बारे में विस्तार से बताएंगे।

हर साल कार्तिक महीने के आखिरी 5 दिनों में भगवान शालिग्राम का विवाह तुलसी माता के साथ कराया जाता है। कहते हैं इस विवाह को संपन्न कराने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। साथ ही भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस साल तुलसी विवाह का आयोजन 1 नवंबर से 5 नवंबर तक किया जाएगा। वैसे ज्यादातर लोग 2 नवंबर को तुलसी विवाह पर्व मनाएंगे क्योंकि इस दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वादशी है जो तुलसी विवाह संपन्न कराने के लिए सबसे शुभ तिथि मानी जाती है। यहां हम आपको बताएंगे कौन हैं भगवान शालिग्राम और हर साल क्यों इनकी तुलसी जी से शादी कराई जाती है।

भगवान शालिग्राम कौन हैं?

भगवान शालिग्राम श्री हरि विष्णु भगवान का स्वरूप माने जाते हैं। जो एक शिला के रूप में पूजे जाते हैं और ये शिला नेपाल में गंडकी नदी के तल में पायी जाती है। यह कोई साधारण शिला या पत्थर नहीं होता, बल्कि इसमें भगवान विष्णु का निवास माना जाता है। इन पर शंख, चक्र, गदा, पद्म जैसे चिन्ह बने होते हैं। ये स्वयंभू होने की वजह से इनकी प्राण प्रतिष्ठा की जरूरत नहीं होती। यानी भक्त इन्हें घर में लाकर सीधे पूज सकते हैं।

शालिग्राम भगवान की कथा

कथा के अनुसार, वृंदा नाम की एक स्त्री थीं जिनका विवाह दानवराज जालंधर से हुआ था। जालंधर को उसकी पत्नी वृंदा की पतिव्रता शक्ति से बल मिलता था जिस कारण उसे हरा पाना लगभग असंभव था। उसने हर जगह हाहाकार मचा रखा था जिससे सभी देवी-देवता बहुत परेशान थे। तब भगवान विष्णु ने जालंधर को मारने की एक योजना बनाई। भगवान जानते थे कि जालंधर को तभी मारा जा सकता है जब उसकी पत्नी का पतिव्रता धर्म टूटेगा। भगवान विष्णु जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के पास पहुंच गए और वृंदा उनके साथ पतिव्रता का व्यवहार करने लगीं, जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया और जालंधर मारा गया।जब वृंदा को इस छल का पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर भगवान विष्णु को शिला बनने का श्राप दे दिया। कहते हैं यही शिला शालिग्राम कहलाई।

भगवान विष्णु के शिला बन जाने की वजह से ब्रम्हांड में असंतुलन की स्थिति पैदा हो गई। यह देखकर सभी देवी-देवता देवी वृंदा से भगवान विष्णु को श्राप मुक्त करने की प्रार्थना करने लगे। तब वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप मुक्त किया और इसके बाद उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया। कहते हैं जहां वृंदा भस्म हुईं वहीं तुलसी का पौधा निकल आया। भगवान विष्णु ने उनके प्रेम और समर्पण को देखते हुए कहा कि आज से तुम मेरे समान पूजनीय हो। मेरा पूजन तुम्हारे बिना अधूरा रहेगा और जो मेरे स्वरूप शालिग्राम का तुम्हारे साथ विवाह रचाएगा उसके जीवन में सदैव सुख-समृद्धि बनी रहेगी। कहते हैं इसी कारण हर वर्ष शालिग्राम भगवान और तुलसी माता का विवाह कराया जाता है।

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