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Nepal Disaster : नेपाल आपदा में तबाही, 579 मौतें और 1900 से ज्यादा लोग लापता, बालेन शाह का बड़ा फैसला

नेपाल की भीषण आपदा में सैकड़ों लोगों की मौत और हजारों लापता हैं, जबकि बालेन शाह ने विदेशी मदद पर बड़ा फैसला लिया।

नेपाल में आई भीषण बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी आपदा ने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी है। नेपाल में अब तक 579 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 1,924 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है, लेकिन दुर्गम पहाड़ी इलाकों, मलबे और खराब संपर्क व्यवस्था की वजह से रेस्क्यू टीमों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। अब तक हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है और बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी अभियान में लगाए गए हैं। 

ग्लेशियर से शुरू हुई तबाही, नदियों ने मचाई भारी तबाही

नेपाल-चीन सीमा के पास ग्लेशियर से जुड़े मलबे और अचानक आई बाढ़ ने कई इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। तेज पानी और मलबे के बहाव ने सड़कें, पुल, घर और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। हाइड्रोपावर परियोजनाओं पर भी इसका असर पड़ा है। कई इलाकों में लोगों का संपर्क टूट गया और बड़ी संख्या में लोग लापता हो गए।

त्रिशूली और भोटेकोशी नदी के आसपास के इलाकों में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक बताई जा रही है। राहतकर्मी मलबे के बीच फंसे लोगों की तलाश कर रहे हैं। कई जगहों पर सुरंगों और क्षतिग्रस्त निर्माण स्थलों में भी खोज अभियान चलाया जा रहा है। 

नई झील ने बढ़ाई चिंता

आपदा के बाद एक और संभावित खतरा सामने आया है। सीमा क्षेत्र में मलबे के कारण पानी के प्रवाह में रुकावट पैदा हुई और अस्थायी झील बनने की स्थिति बनी। अगर पानी का दबाव अचानक बढ़ता है और यह प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो नीचे की ओर बसे इलाकों में दोबारा फ्लैश फ्लड का खतरा पैदा हो सकता है।

इसी वजह से प्रशासन संवेदनशील इलाकों पर लगातार नजर रख रहा है और लोगों को नदी किनारे से दूर रहने की सलाह दी जा रही है। कुछ इलाकों में संभावित खतरे को देखते हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। 

320 भारतीय अभी भी लापता

इस आपदा ने भारत की चिंता भी बढ़ा दी है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक करीब 320 भारतीय नागरिक अभी संपर्क से बाहर हैं। इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए लोग और नेपाल में काम करने वाले भारतीय नागरिक शामिल हैं। इसके अलावा करीब 100 भारतीय मूल के लोगों से भी संपर्क नहीं हो पाया है।

भारत सरकार नेपाल और चीन के अधिकारियों के संपर्क में है। चीन के तिब्बत क्षेत्र में फंसे कई भारतीयों को सुरक्षित निकालकर नेपाल पहुंचाया गया है। भारत की ओर से नेपाल के लिए राहत सामग्री भी भेजी जा रही है और लापता भारतीयों की तलाश के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। 

बालेन शाह ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को क्यों कहा ना?

आपदा के बीच नेपाल सरकार के एक फैसले ने खासा ध्यान खींचा है। प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार ने फिलहाल विदेशी सर्च और रेस्क्यू टीमों की मदद लेने से इनकार किया है। नेपाल का कहना है कि उसकी सेना, पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसियां राहत और बचाव अभियान संभालने में सक्षम हैं।

भारत, चीन, दक्षिण कोरिया, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और अन्य देशों की ओर से अलग-अलग स्तर पर सहायता और रेस्क्यू टीम भेजने की पेशकश की गई थी। नेपाल ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को तत्काल अनुमति नहीं दी, हालांकि मानवीय सहायता और तकनीकी सहयोग के लिए रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया गया है।

नेपाल के इस फैसले के पीछे 2015 के विनाशकारी भूकंप का अनुभव भी अहम माना जा रहा है। उस समय बड़ी संख्या में विदेशी टीमें नेपाल पहुंची थीं और राहत अभियान के दौरान अलग-अलग टीमों के बीच तालमेल बनाए रखना चुनौती बना था। इस बार नेपाल सरकार राहत और बचाव अभियान को अपनी सुरक्षा एजेंसियों के जरिए केंद्रीकृत तरीके से चलाना चाहती है। 

भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ

नेपाल ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को लेकर भले ही सावधानी बरती हो, लेकिन भारत की ओर से मानवीय सहायता जारी है। भारत ने राहत सामग्री की खेप भेजी है और नेपाल में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

फिलहाल नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती हजारों लापता लोगों की तलाश, प्रभावित क्षेत्रों में राहत पहुंचाना और संभावित नई बाढ़ के खतरे से लोगों को बचाना है। पहाड़ी इलाकों में मलबे और खराब संपर्क व्यवस्था के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन में समय लग सकता है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन नेपाल के लिए बेहद अहम रहने वाले हैं।

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