राजस्थान के झुंझुनूं जिले से एक ऐसी दर्दभरी कहानी सामने आई है, जिसने पूरे इलाके को भावुक कर दिया। महज 19 साल की उम्र में देश सेवा का सपना लेकर भारतीय सेना में शामिल हुए अग्निवीर प्रदीप कुमार अब इस दुनिया में नहीं रहे। हादसे वाले दिन उन्होंने अपने पिता से फोन पर कहा था, “पापा, मैं बिल्कुल ठीक हूं।” लेकिन परिवार को क्या पता था कि यह उनके बेटे की आखिरी आवाज होगी।

कुछ ही घंटों बाद झारखंड की राजधानी रांची में तैनात प्रदीप कुमार एक दर्दनाक हादसे का शिकार हो गए और देश सेवा के दौरान शहीद हो गए। गुरुवार को जब उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर पैतृक गांव पहुंचा तो पूरा गांव गम में डूब गया। हर आंख नम थी और हर जुबान पर एक ही नाम था—प्रदीप कुमार।
आखिरी बातचीत बन गई जिंदगी भर की याद
प्रदीप कुमार के पिता जगदीश प्रसाद ने नम आंखों से बताया कि 16 जून की दोपहर करीब तीन बजे उनकी बेटे से फोन पर बातचीत हुई थी। उस समय प्रदीप अपनी ड्यूटी पर तैनात था।
पिता के अनुसार, प्रदीप ने फोन पर कहा था, “पापा, मैं अभी स्विमिंग पूल पर ऑन ड्यूटी हूं और बिल्कुल ठीक हूं।” इसके बाद उसने अपनी मां से भी बात की और घर-परिवार का हालचाल जाना। बातचीत सामान्य थी और किसी को अंदाजा नहीं था कि यह परिवार और बेटे के बीच आखिरी संवाद साबित होगा।
कुछ समय बाद रांची स्थित 623 ईएमई बटालियन के स्विमिंग पूल परिसर में एक हादसा हो गया, जिसमें प्रदीप की जान चली गई।
राजकीय सम्मान के साथ हुआ अंतिम संस्कार
गुरुवार को प्रदीप कुमार का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनके पैतृक गांव चिमनपुरा (बाडेट) में किया गया। भारतीय सेना की टुकड़ी ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर देकर अंतिम सलामी दी।
तिरंगे में लिपटे बेटे को देखकर परिजन खुद को संभाल नहीं सके। मां बार-बार बेटे को देखकर बेसुध हो जाती थीं, जबकि पिता की आंखों में आंसू और चेहरे पर गर्व दोनों साफ दिखाई दे रहे थे।
अंतिम यात्रा में हजारों ग्रामीण शामिल हुए। “भारत माता की जय” और “प्रदीप कुमार अमर रहें” के नारों से पूरा गांव गूंज उठा। लोगों ने अपने वीर बेटे को नम आंखों से अंतिम विदाई दी।
बचपन से था सेना में जाने का जुनून
परिजनों के अनुसार प्रदीप बचपन से ही देशभक्ति की भावना से प्रेरित था। पढ़ाई में भी वह बेहद होनहार छात्र था। उसने 12वीं कक्षा में 92 प्रतिशत अंक हासिल किए थे।
परिवार चाहता था कि वह किसी अन्य प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करे और बेहतर करियर विकल्प चुने, लेकिन प्रदीप का सपना सिर्फ भारतीय सेना में शामिल होना था।
पिता बताते हैं कि एक बार उन्होंने बेटे को सेना के अलावा अन्य विकल्पों पर विचार करने की सलाह दी थी। तब प्रदीप ने दृढ़ता से कहा था, “पापा, मेरी इच्छा सिर्फ देश के लिए जीने और मरने की है। मैं सेना में जाकर देश सेवा करना चाहता हूं।”
बेटे की इस इच्छा का सम्मान करते हुए परिवार ने भी उसका साथ दिया और 23 अप्रैल 2025 को वह भारतीय सेना में अग्निवीर के रूप में भर्ती हो गया।
छुट्टी पर लौटने का वादा अधूरा रह गया
करीब दो महीने पहले ही प्रदीप ने अपनी ट्रेनिंग पूरी की थी। प्रशिक्षण के बाद वह पहली बार छुट्टी लेकर घर आया था और परिवार के साथ कुछ यादगार पल बिताए थे।
घर से वापस ड्यूटी पर लौटते समय उसने परिवार से वादा किया था कि अगले महीने फिर छुट्टी लेकर आएगा। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। इस बार वह छुट्टियां मनाने नहीं, बल्कि तिरंगे में लिपटकर अपने गांव लौटा।
सेना के फोन ने तोड़ दी परिवार की उम्मीद
हादसे के बाद यूनिट के सूबेदार मेजर ने सबसे पहले प्रदीप के पिता को फोन कर जानकारी दी कि वह स्विमिंग पूल में गिर गया है और डॉक्टर उसका इलाज कर रहे हैं।
यह सुनकर परिवार चिंतित जरूर हुआ, लेकिन उन्हें भरोसा था कि प्रदीप जल्द स्वस्थ होकर घर लौट आएगा। हालांकि करीब आधे घंटे बाद दोबारा फोन आया और इस बार खबर बेहद दुखद थी।
सैन्य अधिकारी ने भारी आवाज में कहा, “साहब, हौसला रखना… बहुत कोशिशों के बावजूद हम प्रदीप को बचा नहीं पाए।”
यह सुनते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और घर में मातम छा गया।
गांव को गम भी, गर्व भी
महज 19 वर्ष की उम्र में प्रदीप कुमार के निधन ने पूरे झुंझुनूं जिले को शोक में डुबो दिया है। हालांकि इस दुख के बीच गांव और परिवार को अपने वीर बेटे पर गर्व भी है, जिसने देश सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
पिता जगदीश प्रसाद कहते हैं कि बेटा आज भले ही उनके बीच नहीं है, लेकिन उसने अपने सपने को पूरा करते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है। यही बात उन्हें गर्व का एहसास कराती है।
ग्रामीणों का कहना है कि प्रदीप कुमार का बलिदान आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देता रहेगा। उनके जाने से एक परिवार ने अपना बेटा खोया है, लेकिन देश ने एक ऐसे युवा सपूत को पाया है जिसकी कहानी लंबे समय तक याद रखी जाएगी।
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