
केंद्र और प्रदेश सरकारें किसानों की आय दोगुनी करने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के दावे कर रही हैं। किसान सम्मान निधि जैसी कई योजनाएं भी चलाई जा रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात इन दावों की पोल खोलते नजर आ रहे हैं। कानपुर देहात में जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही और औद्योगिक इकाइयों की मनमानी ने किसानों को ऐसे हालात में ला खड़ा किया है, जहां अब खेती छोड़कर मजदूरी करने का विचार मजबूरी बनता जा रहा है। परिवार की जिम्मेदारी और पेट पालने की चिंता में किसान टूटता हुआ नजर आ रहा है, जबकि प्रशासनिक स्तर पर कोई सुनवाई होती नहीं दिख रही।
यह तस्वीर कानपुर देहात के रनिया नगर पंचायत क्षेत्र की है, जहां खेतों में लबालब भरा पानी किसानों की मेहनत पर भारी पड़ रहा है। धान की फसल, जो करीब दो महीने पहले कट जानी चाहिए थी, आज भी खेतों में खड़ी है और लगातार सड़ती जा रही है। खेतों में जल निकासी की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है, जिससे पानी निकल ही नहीं पा रहा। हालात और भी गंभीर तब हो गए, जब आसपास की फैक्ट्रियों से निकलने वाला केमिकल युक्त पानी भी खेतों में छोड़ दिया गया, जिससे फसल को भारी नुकसान पहुंचा है।
किसानों का कहना है कि उन्होंने अपने स्तर पर इंजन लगाकर खेतों से पानी निकालने की कोशिश की, लेकिन जलभराव इतना अधिक है कि सभी प्रयास बेकार साबित हुए। पानी निकलने का कोई रास्ता न होने के कारण फसल खेतों में ही गलने लगी। मेहनत, समय और पैसे से तैयार की गई फसल आंखों के सामने बर्बाद हो रही है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे बैठे हैं।
किसानों ने उप जिलाधिकारी से लेकर जिलाधिकारी तक कई बार लिखित शिकायतें कीं, लेकिन न तो कोई अधिकारी मौके पर पहुंचा और न ही समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस कदम उठाया गया। प्रशासन की उदासीनता के चलते किसानों की पूरी लागत खेतों में ही डूब गई। फसल बिकने से पहले ही नष्ट हो गई और अब परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है।
किसानों का दर्द है कि जब फसल ही हाथ नहीं लगी, तो कर्ज कैसे चुकाया जाएगा और घर का खर्च कैसे चलेगा। मजबूरी में अब वे खेती छोड़कर मजदूरी करने की बात सोचने लगे हैं। जिन खेतों से कभी घर चलता था, आज वही खेत रोजी-रोटी का संकट बन गए हैं।
जलभराव के चलते न तो अगली फसल गेहूं की बुवाई हो पा रही है और न ही किसानों को अपनी लागत वापस मिलने की कोई उम्मीद दिखाई दे रही है। परिवार के सामने भुखमरी जैसे हालात बनते जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन कभी इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान देगा, या फिर यूं ही किसानों की मेहनत पानी में बहती रहेगी?
जब फसल ही नहीं होगी, तो किसानों की आय दोगुनी करने का सपना कैसे साकार होगा। सरकारी योजनाएं कागजों में भले ही मजबूत नजर आती हों, लेकिन कानपुर देहात में किसानों की हालत यह बताने के लिए काफी है कि जिले के जिम्मेदार किस तरह इन योजनाओं को पलीता लगा रहे हैं। किसान आज भी आस लगाए बैठा है कि शायद कभी उसकी आवाज सुनी जाएगी और उसकी मेहनत को उसका हक मिलेगा।




