लखीमपुर खीरी से एक बड़ी और भावनात्मक खबर सामने आई है।

रमिया बेहढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) परिसर में आशा संगिनियों ने अपने हक और मानदेय बढ़ाने की मांग को लेकर कड़ी ठंड में धरना प्रदर्शन शुरू किया है। स्वास्थ्य विभाग की ये जमीनी कार्यकर्ता खुले आसमान के नीचे ठिठुरती सर्दी में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं।
उत्तर प्रदेश के जनपद लखीमपुर खीरी के रमिया बेहढ़ सीएचसी परिसर में सुबह से ही सैकड़ों की संख्या में आशा संगिनियां एकजुट होकर धरने पर बैठ गईं। इन महिलाओं का कहना है कि वे स्वास्थ्य विभाग की “रीढ़ की हड्डी” हैं — गांव-गांव जाकर मातृ स्वास्थ्य, बच्चों के टीकाकरण, और जनस्वास्थ्य योजनाओं को सफल बनाती हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें उनके परिश्रम के अनुरूप पारिश्रमिक नहीं मिल रहा है।
धरने पर बैठी आशा संगिनियों ने बताया कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आशाओं के मानदेय में वृद्धि की घोषणा किए जाने के बाद भी जमीनी स्तर पर उन्हें इसका लाभ नहीं मिला है। उनका आरोप है कि “न तो मानसिक सैलरी बढ़ाई गई है और न ही समय पर भुगतान मिल रहा है।”
उन्होंने कहा कि जब प्रधानमंत्री जी की ओर से बढ़ोतरी की बात कही गई थी, तब उम्मीद जगी थी कि अब उनके जीवन में सुधार आएगा, लेकिन आज भी स्थिति पहले जैसी ही है। कई बार भुगतान महीनों तक लंबित रहता है।
धरना स्थल पर मौजूद एक आशा संगिनी ने बताया —
“हम सुबह से यहां बैठे हैं, लेकिन ठंड से बचाव या भोजन की कोई व्यवस्था नहीं की गई। हमसे स्वास्थ्य विभाग की हर जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन जब हमारी बात आती है तो अधिकारी और विभाग मौन हो जाते हैं।”
दूसरी आशा कार्यकर्ता ने कहा —
“हम गांवों में गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाती हैं, टीकाकरण अभियान चलाती हैं, और जनस्वास्थ्य का काम करती हैं। परंतु इतने कम मानदेय में घर चलाना मुश्किल है। सरकार से निवेदन है कि जल्द से जल्द हमारी सैलरी निर्धारित की जाए।”
धरने के दौरान सीएचसी के किसी भी अधिकारी ने प्रदर्शन कर रही महिलाओं से मिलने या बातचीत करने की ज़हमत नहीं उठाई। ठंड से कांपती महिलाओं ने अपने सिर पर चादरें और शॉल डालकर खुले मैदान में ही डेरा जमा रखा है। कई कार्यकर्ता बीमार होने के बावजूद धरने पर डटी हुई हैं।
आशा संगिनियों ने राज्य सरकार से निम्नलिखित प्रमुख मांगें रखी हैं —
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आशाओं की मानसिक सैलरी (फिक्स सैलरी) निर्धारित की जाए।
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मानदेय समय पर भुगतान किया जाए।
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स्वास्थ्य विभाग द्वारा कार्यकर्ताओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित किया जाए।
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जमीनी स्तर पर अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
धरना प्रदर्शन की जानकारी मिलते ही कई सामाजिक संगठनों ने भी आशा संगिनियों का समर्थन किया है। वहीं प्रशासनिक स्तर पर अब तक किसी अधिकारी ने वार्ता के लिए पहल नहीं की है।
कड़कड़ाती सर्दी में खुले आसमान के नीचे बैठी आशा संगिनियां न सिर्फ अपने हक के लिए लड़ रही हैं, बल्कि यह प्रदर्शन सरकार और प्रशासन के लिए एक सवाल भी खड़ा कर रहा है —
क्या देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली ये महिलाएं यूं ही ठंड में तड़पती रहेंगी, या सरकार अब उनकी आवाज सुनेगी?
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