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EC Trust : चुनाव आयोग पर सवालों के बीच ओम प्रकाश रावत और अशोक लवासा बोले

चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों के बीच बोले पूर्व CEC ओम प्रकाश रावत और अशोक लवासा, पारदर्शिता पर दिया जोर

नई दिल्ली: चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और संस्था की विश्वसनीयता को लेकर इन दिनों राजनीतिक और सार्वजनिक बहस तेज है। इसी बीच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चुनाव आयोग की मौजूदा स्थिति और उससे जुड़े सवालों पर अपनी राय रखी है। दोनों पूर्व अधिकारियों ने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के प्रति जनता का विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

यह चर्चा इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ 2026 के दौरान हुई। दोनों पूर्व चुनाव आयुक्तों से मौजूदा विवादों के बीच चुनाव आयोग पर भरोसे को लेकर सवाल पूछा गया था। ओम प्रकाश रावत ने किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरी स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार करने की बात कही, जबकि अशोक लवासा ने कहा कि फिलहाल चुनाव आयोग को लेकर भरोसे की कमी का माहौल दिखाई दे रहा है।

ओम प्रकाश रावत ने कहा- सवालों का जवाब देना जरूरी

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत ने कहा कि भारत का चुनाव आयोग पिछले 75 से अधिक वर्षों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाली संस्था के तौर पर अपनी एक पहचान बना चुका है। हालांकि, उन्होंने माना कि मौजूदा विवादों के कारण आयोग की विश्वसनीयता को लेकर चर्चा हो रही है।

रावत के मुताबिक, संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज के दौरान विवाद सामने आना असामान्य नहीं है। इसलिए किसी मामले के पूरी तरह स्पष्ट होने से पहले उसके आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। उन्होंने स्थिति स्पष्ट होने के लिए कुछ समय इंतजार करने की जरूरत बताई।

उन्होंने साथ ही कहा कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता सीधे तौर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के भरोसे से जुड़ी है। अगर मतदाताओं का आयोग पर विश्वास कमजोर होता है तो उसका प्रभाव पूरी चुनावी व्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में आयोग के सामने उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब देना जरूरी है।

रावत ने यह भी कहा कि सिर्फ प्रेस नोट जारी करने से हर सवाल का समाधान नहीं होगा। उनके अनुसार, आयोग के सदस्यों को सामने आकर मीडिया और जनता के सवालों का जवाब देना चाहिए, जिससे किसी भी तरह की गलतफहमी की गुंजाइश कम हो सके।

अशोक लवासा बोले- भरोसे की कमी का माहौल

पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर सवाल पूछे जा रहे हैं। उनके अनुसार, फिलहाल आयोग को लेकर भरोसे की कमी का माहौल है और आयोग के कुछ कदमों ने इस धारणा को और मजबूत किया है।

हालांकि, लवासा ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को केवल मौजूदा तीन चुनाव आयुक्तों या किसी एक व्यक्ति के फैसलों के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आयोग पिछले कई दशकों में एक संस्थागत व्यवस्था के रूप में मजबूत हुआ है और कुछ व्यक्तियों से जुड़े विवादों के आधार पर पूरी संस्था को खारिज नहीं किया जा सकता।

SIR प्रक्रिया पर भी उठाए सवाल

अशोक लवासा ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मौजूदा प्रक्रिया में मतदाता पर अपनी पात्रता साबित करने की जिम्मेदारी पहले की तुलना में अधिक दिखाई देती है।

उनके मुताबिक, लंबे समय से मतदाता सूची तैयार करने और उसे अपडेट करने में चुनाव आयोग तथा उसकी फील्ड मशीनरी की अहम भूमिका रही है। लेकिन SIR के मौजूदा स्वरूप में पात्र मतदाता को अपने दस्तावेज और पात्रता साबित करने के लिए अतिरिक्त प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।

लवासा ने संविधान के अनुच्छेद 326 का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मतदाता बनने के लिए नागरिकता, 18 वर्ष या उससे अधिक आयु और कानून के तहत अयोग्य न होना जैसी मूल शर्तें निर्धारित हैं। ऐसे में मतदाता सूची से नाम हटाने या पात्रता की जांच के लिए अतिरिक्त दस्तावेजों और प्रक्रियाओं की जरूरत किस आधार पर तय की गई, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।

Form 6 में बदलाव को लेकर भी सवाल

लवासा ने Form 6 में हुए बदलावों को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने जानना चाहा कि इन बदलावों का फैसला किस स्तर पर लिया गया और क्या इसके लिए आवश्यक मंजूरियां ली गई थीं। उनका कहना था कि मौजूदा विवाद से जुड़े कई सवालों का जवाब तथ्यों और पूरी जानकारी के साथ सामने आना चाहिए।

रावत ने दूसरी ओर चुनावी प्रक्रिया में काम करने वाली विशाल फील्ड मशीनरी की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि चुनाव प्रक्रिया में करीब डेढ़ करोड़ से अधिक कर्मचारी अलग-अलग स्तरों पर शामिल होते हैं। इसलिए कुछ व्यक्तियों या फैसलों को लेकर उठे सवालों को पूरी चुनावी मशीनरी पर लागू करना उचित नहीं होगा।

दोनों पूर्व चुनाव आयुक्तों की बातों में एक साझा बिंदु सामने आया—चुनाव आयोग की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पारदर्शिता जरूरी है। रावत ने जहां आयोग से सीधे सवालों का जवाब देने की बात कही, वहीं लवासा ने प्रक्रियाओं और फैसलों से जुड़े तथ्यों को सार्वजनिक करने पर जोर दिया। मौजूदा विवाद के बीच अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव आयोग इन सवालों और SIR से जुड़ी चिंताओं पर किस तरह स्पष्टीकरण देता है।

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