
नई दिल्ली: भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित BRICS+ सम्मेलन के दौरान चीन और ईरान के रिश्तों को लेकर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आई। सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन मौजूद रहे, लेकिन दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक रूप से न तो कोई खास बातचीत दिखाई दी और न ही उनकी किसी प्रमुख द्विपक्षीय मुलाकात की जानकारी सामने आई। यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि चीन और ईरान लंबे समय से एक-दूसरे को रणनीतिक साझेदार बताते रहे हैं।
शी जिनपिंग का भारत दौरा भी काफी संक्षिप्त रहा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और वैश्विक दक्षिण से जुड़े मुद्दों पर चीन की भूमिका तथा सुरक्षा संबंधी पहलों को लेकर समर्थन जुटाने की कोशिश की। हालांकि, ईरानी राष्ट्रपति के साथ उनकी संभावित बैठक या विस्तृत बातचीत की कोई प्रमुख जानकारी सामने नहीं आई।
आर्थिक साझेदारी के बावजूद रिश्ते क्यों हैं जटिल?
चीन और ईरान के संबंधों में आर्थिक हितों की बड़ी भूमिका है। चीन ईरान का सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है और ईरान से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है। इसके बदले ईरान चीन से मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक उत्पाद और दूसरी जरूरी वस्तुओं का आयात करता है। इस व्यापार ने दोनों देशों के रिश्तों को मजबूती दी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह साझेदारी पूरी तरह समान स्तर की नहीं है।
वॉशिंगटन स्थित Stimson Center की China Program निदेशक यून सन के मुताबिक, बीजिंग फिलहाल तेहरान के साथ जरूरत से ज्यादा करीबी दिखाने से बचता है। उनके अनुसार चीन की मध्य पूर्व नीति केवल ईरान पर निर्भर नहीं है और बीजिंग ने क्षेत्र के दूसरे प्रभावशाली देशों के साथ भी अपने संबंध मजबूत किए हैं।
SCO बैठक में भी नहीं दिखी खास नजदीकी
इससे पहले किर्गिस्तान के बिश्केक में आयोजित Shanghai Cooperation Organization यानी SCO की बैठक में भी चीन और ईरान के नेताओं के बीच ऐसी सार्वजनिक नजदीकी नहीं दिखाई दी थी, जैसी चीन और रूस या मध्य एशियाई देशों के नेताओं के बीच देखने को मिली। शी जिनपिंग ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत कई नेताओं के साथ प्रमुख मुलाकातें कीं, जबकि पेजेशकियन के साथ उनकी बातचीत सार्वजनिक रूप से ज्यादा चर्चा में नहीं रही।
25 साल का समझौता, लेकिन निवेश उम्मीद से कम
साल 2021 में चीन और ईरान ने 25 साल के व्यापक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते में ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, व्यापार और सुरक्षा जैसे कई क्षेत्र शामिल थे। उस समय इसे दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने वाला कदम बताया गया था।
हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि समझौते के बाद ईरान में चीन की ओर से उस स्तर का निवेश नहीं हुआ, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। वहीं चीन ने सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों के साथ भी आर्थिक और कूटनीतिक संबंध तेजी से बढ़ाए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि बीजिंग की मध्य पूर्व नीति केवल तेहरान-केंद्रित नहीं है।
ईरान भी चीन पर पूरी तरह निर्भर नहीं होना चाहता
विशेषज्ञों के मुताबिक ईरान में भी चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर सावधानी रही है। Jamestown Foundation के मैथ्यू जॉनसन के अनुसार, ईरान के कुछ वर्गों को आशंका रही है कि चीन के अत्यधिक प्रभाव से उनका देश किसी बड़ी शक्ति पर जरूरत से ज्यादा निर्भर दिखाई दे सकता है।
इसी तरह यून सन का कहना है कि ईरान भी चीन के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता है। दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग होने के बावजूद तेहरान अपनी विदेश नीति में पूरी तरह बीजिंग पर निर्भर नहीं होना चाहता।
सैन्य सहयोग को लेकर भी उठे सवाल
हाल के वर्षों में ईरान की सैन्य और सुरक्षा क्षमताओं में चीन की संभावित भूमिका को लेकर भी चर्चा होती रही है। Wall Street Journal की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ईरान को जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने की हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरें चीनी संस्थाओं से मिली थीं। हालांकि, रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि तस्वीरें किस चीनी संस्था ने उपलब्ध कराईं।
चीन ने ऐसे आरोपों पर कहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करता है और ईरान से जुड़े संघर्षों के संदर्भ में चीन को बदनाम करने की कोशिशों का विरोध करता है।
चीन का प्रभाव सीमित या रणनीतिक?
चीन ने ईरान की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के समर्थन की बात कही है, लेकिन साथ ही तेहरान से बातचीत और कूटनीतिक समाधान का रास्ता अपनाने की अपील भी की है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी देश पर वास्तविक प्रभाव का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि वह दूसरे देश के फैसलों को कितना प्रभावित कर सकता है।

इस नजरिए से देखें तो चीन और ईरान के बीच व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग जरूर मौजूद है, लेकिन ईरान की विदेश और सुरक्षा नीति पर बीजिंग का निर्णायक प्रभाव दिखाई नहीं देता। BRICS+ और SCO बैठकों में दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक दूरी ने इसी जटिल रिश्ते को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।




