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Forced Land Acquisition-सिंचाई विभाग पर गंभीर आरोप, किसानों की जमीन जबरन कब्जाने का मामला उजागर

जनहित और विकास के नाम पर किसानों के साथ हो रहे अन्याय की एक बेहद गंभीर तस्वीर जिले से सामने आई है। सिंचाई विभाग के एक प्रोजेक्ट में न तो जमीन की विधिवत मंजूरी ली गई, न ही बैनामा कराया गया और न ही प्रभावित किसानों को कोई वाजिब मुआवजा दिया गया। आरोप है कि सिंचाई विभाग और उनके ठेकेदार दबंगई के बल पर किसानों की खेतिहर जमीनों पर जबरन कब्जा कर रहे हैं, जिससे अन्नदाता बेबस होकर दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है।

पीड़ित किसानों का कहना है कि सिंचाई विभाग के अधिकारियों और ठेकेदारों को न तो भू-स्वामियों की सहमति चाहिए और न ही किसी कानूनी प्रक्रिया की परवाह है। विभागीय प्रोजेक्ट के नाम पर जबरन खेतों में मशीनें उतार दी गईं और किसानों की जमीन पर कब्जा कर लिया गया।

किसानों का आरोप है कि जिस जमीन पर उनकी खड़ी फसल थी, उसे भी बेरहमी से रौंदकर बर्बाद कर दिया गया। महीनों की मेहनत पल भर में मिट्टी में मिला दी गई, लेकिन आज तक न तो फसल का मुआवजा मिला और न ही जमीन अधिग्रहण की कोई लिखित कार्रवाई दिखाई गई।

जब किसानों ने मौके पर इसका विरोध किया, तो हालात और भयावह हो गए। आरोप है कि ठेकेदार के लोग खुलेआम दबंगई पर उतर आए। किसानों का कहना है कि ठेकेदार साहब विरोध कर रहे किसानों को डराने के लिए शर्ट उठाकर असलहा तक दिखाने लगे। वहीं, मौके पर मौजूद जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई करने के बजाय उल्टे किसानों को ही धमकाते नजर आए।

पीड़ित किसानों का कहना है कि उन्हें साफ शब्दों में कहा गया कि “काम नहीं रुका तो जमीन यूं ही जाएगी”, जिससे गांव में दहशत का माहौल बन गया।

किसानों ने इस पूरे मामले की शिकायत सिंचाई विभाग के उच्च अधिकारियों से लेकर प्रशासन तक की, लेकिन कहीं भी उनकी सुनवाई नहीं हुई। मजबूर होकर किसान रोजाना सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, मगर न कोई लिखित आश्वासन मिला और न ही कोई ठोस कार्रवाई होती दिख रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी सरकारी परियोजना में बिना भू-स्वामियों की सहमति और बिना मुआवजे के जमीन ली जा सकती है?
क्या दबंग ठेकेदारों को किसानों की जमीन रौंदने की खुली छूट दी गई है?
और आखिर किसके संरक्षण में सिंचाई विभाग का यह पूरा खेल चल रहा है?

देश को भोजन देने वाला अन्नदाता आज अपने ही हक के लिए भटक रहा है। खेत उजड़ गए, फसल बर्बाद हो गई और बदले में किसानों के हिस्से सिर्फ आंसू आए हैं। अगर समय रहते इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई और दोषियों पर कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला बड़े किसान आंदोलन का रूप भी ले सकता है।

फिलहाल, सिंचाई विभाग के इस प्रोजेक्ट ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी किसानों को न्याय दिलाते हैं या फिर जनहित के नाम पर अन्नदाता का शोषण यूं ही चलता रहेगा।

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