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Orai Police Controversy : उरई में अवैध कब्जे को पुलिस का संरक्षण- मकान मालिक-किरायेदार विवाद

उरई शहर के राजेंद्र नगर इलाके से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न केवल मकान मालिक-किरायेदार विवाद को तूल दिया है बल्कि पुलिस की निष्पक्षता और कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विवाद अब केवल किराए के झगड़े तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी, पुलिस संरक्षण और कानून के समान व्यवहार पर बहस का विषय बन गया है।

जानकारी के अनुसार, राजेंद्र नगर क्षेत्र में एक मकान को लेकर बीते 14 वर्षों से किराए पर रह रहा किरायेदार मकान खाली करने से साफ़ इंकार कर रहा है। मकान मालिक ने आरोप लगाया है कि किरायेदार ने दो लाख रुपये की अवैध मांग की है और पैसे न देने की स्थिति में मकान पर जबरन कब्जा बनाए रखा है।

विवाद बढ़ने पर मकान मालिक ने उरई कोतवाली पुलिस से न्याय की गुहार लगाई, लेकिन जो हुआ उसने स्थानीय लोगों को भी हैरान कर दिया।

मकान मालिक का आरोप है कि कोतवाली प्रभारी ने निष्पक्ष जांच या कानूनी समाधान निकालने के बजाय, अपने सामने ही किरायेदार का सामान वापस मकान के अंदर रखवा दिया, जिससे पूरे परिवार में आक्रोश फैल गया।
इस कार्रवाई के बाद लोगों ने सवाल उठाया कि —

“क्या यह पुलिस की मध्यस्थता थी या अवैध कब्जे को खुला संरक्षण देने का उदाहरण?”

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, विवाद वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है। ऐसे में पुलिस का एकतरफा हस्तक्षेप कानूनी रूप से भी अनुचित बताया जा रहा है।

राजेंद्र नगर चौकी इंचार्ज ने बयान दिया कि मामला अदालत में लंबित है और पुलिस केवल शांति बनाए रखने का प्रयास कर रही है, लेकिन मकान मालिक का परिवार इस दावे से असहमत है।

पीड़ित मकान मालिक का कहना है कि उन्होंने पहले ही आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा, आरोप है कि पुलिस ने मकान मालिक के पूरे परिवार को हिरासत में लेकर कोतवाली बैठा लिया।

परिवार के अनुसार, आधा दर्जन महिलाओं को महिला थाने में बैठाया गया, जिससे पूरा परिवार मानसिक रूप से टूट गया है। पीड़ितों का यह भी आरोप है कि संबंधित रामनगर चौकी इंचार्ज और विवादित किरायेदार का उपनाम समान होने के कारण पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की और निष्पक्षता से मुंह मोड़ लिया।

मकान मालिक ने कहा कि जब मामला पहले से न्यायालय में विचाराधीन है, तो पुलिस को किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं करना चाहिए। लेकिन इस घटना से यह सवाल खड़ा हो गया है कि—

“जब मामला कोर्ट में है, तो पुलिस को एक पक्ष के समर्थन में कार्रवाई करने का अधिकार किसने दिया?”

इस घटनाक्रम के बाद पूरे राजेंद्र नगर क्षेत्र में आक्रोश और भय का माहौल है। लोग यह पूछ रहे हैं कि यदि कानून के सहारे न्याय मांगने वाले नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार होगा, तो फिर अवैध कब्जाधारियों को और कितना प्रोत्साहन मिलेगा?

इस घटना के बाद स्थानीय नागरिकों में चर्चा है कि क्या उरई में अवैध कब्जों को पुलिस का संरक्षण मिल रहा है?
कई लोगों ने कहा कि अगर मकान मालिक अपने ही घर में असहाय हो जाए और शिकायत करने पर परिवार को हिरासत में लिया जाए, तो यह आम नागरिक के लिए बेहद डराने वाला संकेत है।

कुछ लोगों ने इसे प्रशासनिक असंतुलन और पुलिस की मनमानी का उदाहरण बताया, तो कुछ ने कहा कि यह मामला पूरी तरह से निष्पक्ष जांच की मांग करता है।

उरई के नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की जिला स्तर पर निष्पक्ष जांच कराई जाए।
लोगों का कहना है कि यदि पुलिस पर अवैध कब्जों को संरक्षण देने का आरोप सच साबित होता है, तो यह पूरे सिस्टम की साख को हिला देगा।

स्थानीय लोगों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डीजीपी उत्तर प्रदेश से भी उच्च स्तरीय जांच की अपील की है ताकि पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके और पुलिस की साख बहाल हो सके।

यह घटना सिर्फ एक मकान मालिक और किरायेदार का विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, पुलिस की निष्पक्षता और कानून की साख पर सवाल है।
उरई की यह कहानी अब पूरे जालौन जिले में चर्चा का विषय बन चुकी है, और लोग यह सोचने पर मजबूर हैं कि —

“अगर न्याय की गुहार लगाने वाले को ही आरोपी बना दिया जाए, तो इंसाफ कहां मिलेगा?”

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