सिद्धार्थनगर में विशाल हिन्दू सम्मेलन — एकता, संस्कृति और सनातन के संरक्षण का आह्वान

जनपद सिद्धार्थनगर के बांसी क्षेत्र स्थित तिलक इंटर कॉलेज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के तत्वावधान में एक भव्य और विशाल हिन्दू सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में जिलेभर से आए सैकड़ों श्रद्धालुओं, कार्यकर्ताओं, संतों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि गोरक्ष प्रांत के प्रांतीय प्रचारक रमेश जी, महंत ओइनेश्वर नाथ महादेव, तथा महंत स्वामी जगदानंद सरस्वती जी उपस्थित रहे। मंच संचालन संघ के स्थानीय पदाधिकारियों द्वारा किया गया।
सभा स्थल पर भगवा ध्वज और “जय श्रीराम”, “भारत माता की जय” के नारों से वातावरण गुंजायमान हो उठा। बड़ी संख्या में महिला कार्यकर्ता, विद्यार्थी, किसान और व्यापारी वर्ग के लोग भी उपस्थित रहे।
अपने प्रेरक प्रवचन में महंत स्वामी जगदानंद सरस्वती जी ने कहा कि —
“इस संसार में हर व्यक्ति एक सनातनी के रूप में जन्म लेता है, लेकिन बाद में विभिन्न परिस्थितियों और भ्रमों के कारण उसे अलग-अलग पंथों और मजहबों में बांट दिया जाता है। वास्तव में, सनातन ही एकमात्र धर्म है जो सकल संसार के कल्याण और मंगल की कामना करता है।”
उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक शाश्वत संस्कृति और दर्शन है, जो मानवता, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलना सिखाता है।
प्रांतीय प्रचारक रमेश जी ने अपने संबोधन में कहा कि —
“सनातन हमारी पहचान और अस्तित्व का प्रतीक है। इसे बनाए रखना और आगे बढ़ाना हम सबका कर्तव्य है। सनातन में ऊंच-नीच, भेदभाव या जात-पात का कोई स्थान नहीं है।”
उन्होंने आगे कहा कि मुगलों और अंग्रेज़ों ने भारत की संस्कृति और आत्मा को तोड़ने के असंख्य प्रयास किए, लेकिन वे सनातन की जड़ें नहीं हिला सके। आज भी कुछ शक्तियां सनातन के खिलाफ कुचक्र रच रही हैं, इसलिए समाज को और अधिक संगठित, जागरूक और आत्मनिर्भर होना पड़ेगा।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि सनातन धर्म केवल भारत का नहीं, बल्कि पूरी मानवता का धर्म है। इसका उद्देश्य सभी जीवों के कल्याण और विश्व शांति की स्थापना है।
सभा में युवाओं को संस्कृति से जुड़ने, सामाजिक एकता बनाए रखने और राष्ट्रहित में कार्य करने का आह्वान किया गया।
कॉलेज परिसर में हजारों की भीड़ ने सम्मेलन को ऐतिहासिक बना दिया। लोगों ने भगवा पताकाएं लहराईं और देशभक्ति के गीतों के साथ सनातन धर्म की जयकार की। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगीत के साथ सम्मेलन का समापन हुआ।
सिद्धार्थनगर का यह हिन्दू सम्मेलन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता और सनातन परंपरा के पुनर्जागरण का प्रतीक बनकर सामने आया।
संघ के इस सम्मेलन ने यह संदेश दिया कि यदि समाज संगठित रहेगा, तो कोई भी शक्ति भारत की आत्मा — सनातन धर्म — को कमजोर नहीं कर सकती।
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