बहराइच।
ग्रामीण भारत में रोजगार और विकास की रीढ़ माने जाने वाले महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की ज़मीन पर भ्रष्टाचार लगातार गहराता जा रहा है। शासन द्वारा पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से ऑनलाइन उपस्थिति (डिजिटल हाजिरी) और जियो-टैग्ड फोटो जैसी व्यवस्थाएं लागू किए जाने के बावजूद जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। बहराइच जिले के रिसिया विकासखंड की कई ग्राम पंचायतों में मनरेगा कार्यों में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं और हाजिरी में धांधली के मामले सामने आए हैं।

जानकारी के अनुसार रिसिया ब्लॉक के ग्राम पंचायत रघुनाथपुर, बैजनाथपुर, रामबट्टी, करनिया, गनदौरा, तुला मझौवा, उत्तमापुर सहित अन्य पंचायतों में मनरेगा के तहत कराए जा रहे विकास कार्यों में मजदूरों की उपस्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि कागजों और पोर्टल पर मजदूरों की पूरी हाजिरी दर्शाई जाती है, जबकि वास्तविकता में मौके पर उतने श्रमिक मौजूद ही नहीं होते।
ऑनलाइन हाजिरी भी भ्रष्टाचार पर नहीं लगा पाई लगाम
मनरेगा में भ्रष्टाचार रोकने के लिए शासन ने डिजिटल हाजिरी, मास्टर रोल की ऑनलाइन एंट्री, मजदूरों की ग्रुप फोटो अपलोड और कार्यस्थल की जियो-टैगिंग जैसी व्यवस्थाएं लागू की हैं। उद्देश्य यह था कि फर्जी मजदूरी, फर्जी नाम और भुगतान में हेराफेरी को पूरी तरह खत्म किया जा सके। लेकिन जमीनी स्तर पर इन व्यवस्थाओं का भी गलत इस्तेमाल किया जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक एक मास्टर रोल में अधिकतम 10 श्रमिकों का नाम दर्ज किया जाता है और उन्हीं श्रमिकों की एक ग्रुप फोटो अपलोड की जाती है। इसी प्रक्रिया का दुरुपयोग कर कई जगह सीमित मजदूरों से फोटो खिंचवाकर पूरे सप्ताह की उपस्थिति दर्ज कर दी जाती है। कुछ मामलों में तो श्रमिकों की उपस्थिति केवल कागजों तक सीमित रह जाती है और कार्यस्थल पर सन्नाटा पसरा रहता है।
हाजिरी भरने की प्रक्रिया में खेल
मनरेगा कार्यों में हाजिरी भरने की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत स्तर पर रोजगार सेवक या महिला मेट की होती है। यह हाजिरी ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड की जाती है, जिसकी समीक्षा अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी (एपीओ) और खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) द्वारा की जानी चाहिए। लेकिन आरोप है कि यह समीक्षा केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कई पंचायतों में रोजगार सेवक और मेट की मिलीभगत से फर्जी हाजिरी दर्ज की जा रही है। मजदूरों के नाम मास्टर रोल में दर्ज कर दिए जाते हैं, लेकिन उन्हें पूरे दिन काम पर नहीं बुलाया जाता या फिर कुछ घंटे काम कराकर पूरे दिन की मजदूरी दिखा दी जाती है। इससे शासन की धनराशि का दुरुपयोग हो रहा है और वास्तविक जरूरतमंद मजदूरों को उनका हक नहीं मिल पा रहा।
नोटिस और चेतावनी तक सीमित कार्रवाई
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब भी इस तरह की शिकायतें सामने आती हैं, तो जिम्मेदार अधिकारी इसे “छोटा मामला” बताकर केवल नोटिस या चेतावनी जारी कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई न होने से उनका मनोबल और बढ़ता जा रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायतों के बाद कभी-कभार जांच तो होती है, लेकिन जांच रिपोर्ट में लीपापोती कर मामले को दबा दिया जाता है। न तो किसी रोजगार सेवक को निलंबित किया जाता है और न ही प्रधानों पर कोई ठोस कार्रवाई होती है।
विकास की राशि से ‘अपना विकास’
मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन के साथ-साथ टिकाऊ विकास कार्य कराना है, लेकिन रिसिया ब्लॉक की कई पंचायतों में यह योजना भ्रष्टाचार का जरिया बनती जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि जो धन गांव के विकास पर खर्च होना चाहिए, वही धन प्रधानों और कुछ अधिकारियों की जेब में जा रहा है।
कई स्थानों पर अधूरे कार्य, घटिया गुणवत्ता और नाममात्र का काम दिखाकर पूरा भुगतान निकाल लिया जाता है। मजदूरों को समय से मजदूरी नहीं मिलती, जबकि कागजों में भुगतान पूरा दिखा दिया जाता है।
मनरेगा में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें
इन मामलों से यह साफ होता है कि मनरेगा में भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हो चुकी हैं। सिर्फ तकनीकी व्यवस्था लागू करने से ही भ्रष्टाचार खत्म नहीं किया जा सकता, जब तक कि जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय न हो और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई न की जाए।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना आम जनता का भरोसा खो देगी।
ग्रामीणों की मांग
स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि रिसिया ब्लॉक की सभी ग्राम पंचायतों में मनरेगा कार्यों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही दोषी पाए जाने वाले प्रधानों, रोजगार सेवकों और अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। इसके अलावा, मजदूरों की वास्तविक उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए औचक निरीक्षण और सोशल ऑडिट को प्रभावी बनाया जाए।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
मनरेगा जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम में लगातार सामने आ रही अनियमितताएं प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करती हैं। यदि उच्च अधिकारी समय-समय पर ईमानदारी से निरीक्षण करें और शिकायतों को गंभीरता से लें, तो इस तरह के भ्रष्टाचार पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है।
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