
नई दिल्ली: साफ पानी हर इंसान की बुनियादी जरूरत है, लेकिन अगर पानी को साफ करने वाले संयंत्रों में भी कुछ खतरनाक रसायनों को पूरी तरह हटाना मुश्किल हो जाए, तो चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। भारत में भी ऐसे ही रसायनों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें PFAS यानी ‘फॉरएवर केमिकल्स’ कहा जाता है। चेन्नई में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में भूजल, नदियों, नहरों और झील के पानी में इन रसायनों की मौजूदगी सामने आई। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि एक पारंपरिक जल-शोधन संयंत्र के उपचारित पानी में जांचे गए आठों PFAS की सांद्रता कच्चे पानी की तुलना में अधिक दर्ज की गई।
क्या हैं PFAS रसायन, जिन्हें कहा जाता है ‘फॉरएवर केमिकल्स’?
PFAS का पूरा नाम Per- and Polyfluoroalkyl Substances है। यह हजारों रसायनों का एक बड़ा समूह है, जिनका इस्तेमाल कई घरेलू और औद्योगिक उत्पादों में किया जाता है। नॉन-स्टिक बर्तन, खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग, पानी और तेल से बचाव करने वाली कोटिंग तथा दाग-रोधी कपड़ों जैसे उत्पादों में कुछ PFAS का इस्तेमाल किया जाता रहा है।
इन रसायनों की खास बात यह है कि इनमें से कई पर्यावरण में बहुत लंबे समय तक बने रह सकते हैं। इसी वजह से इन्हें ‘फॉरएवर केमिकल्स’ कहा जाता है। इनके कुछ प्रकार पानी, मिट्टी और जीवों में जमा हो सकते हैं, जिससे इनके लंबे समय तक बने रहने वाले प्रभावों को लेकर चिंता बढ़ती है।
चेन्नई की स्टडी में क्या सामने आया?
IIT मद्रास के शोधकर्ताओं का चेन्नई पर केंद्रित अध्ययन वर्ष 2024 में प्रकाशित हुआ था। इसके लिए दिसंबर 2022 से फरवरी 2023 के बीच पानी के नमूने एकत्र किए गए थे। अध्ययन में भूजल के साथ अडयार नदी, बकिंघम नहर और चेम्बरमबक्कम झील के पानी की भी जांच की गई।
अध्ययन के मुताबिक, एक पारंपरिक जल-शोधन संयंत्र से लिए गए उपचारित पानी में जांचे गए सभी आठ PFAS की सांद्रता कच्चे पानी की तुलना में 5 से 103 प्रतिशत तक अधिक मिली।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि जल-शोधन संयंत्रों में हमेशा PFAS की मात्रा बढ़ती है। शोध में एक संभावित कारण यह बताया गया कि पानी में मौजूद कुछ पूर्ववर्ती रसायन शोधन प्रक्रिया के दौरान बदलकर ऐसे PFAS में परिवर्तित हो सकते हैं, जिन्हें मापना आसान होता है। इसलिए केवल पारंपरिक जल-शोधन प्रक्रिया पर निर्भर रहना इन रसायनों को हटाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।
सेहत के लिए कितने खतरनाक हैं PFAS?
PFAS के सभी रसायनों का असर एक जैसा नहीं होता। हालांकि, कुछ विशिष्ट PFAS के संपर्क को वैज्ञानिक अध्ययनों में कुछ प्रकार के कैंसर, प्रतिरक्षा प्रणाली में बदलाव और हार्मोन संबंधी समस्याओं से जोड़ा गया है। जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-सा रसायन मौजूद है, उसकी मात्रा कितनी है और व्यक्ति कितने समय तक उसके संपर्क में रहता है।
भारत में इन रसायनों के उत्पादन, इस्तेमाल, उत्सर्जन और निपटान से जुड़ा व्यापक आंकड़ा सीमित है। ऐसे में देश में इनके वास्तविक प्रसार और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम का आकलन करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
पानी को सुरक्षित बनाने के लिए क्या करना होगा?
घरेलू गंदा पानी, औद्योगिक उत्सर्जन और खुले कचरा स्थलों से निकलने वाला प्रदूषण PFAS के संभावित स्रोत हो सकते हैं। इन रसायनों को नियंत्रित करने के लिए नियमित निगरानी, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान और जरूरत के अनुसार उन्नत जल-शोधन तकनीकों में निवेश जरूरी है।
कुछ विशेष तकनीकें, जैसे सक्रिय कार्बन, आयन एक्सचेंज और रिवर्स ऑस्मोसिस, चुनिंदा PFAS को हटाने में मदद कर सकती हैं। हालांकि, इनकी प्रभावशीलता रसायन के प्रकार, पानी की गुणवत्ता और इस्तेमाल की गई प्रक्रिया पर निर्भर करती है। उपचार के बाद बचे अपशिष्ट का सुरक्षित निपटान भी जरूरी है।

निष्कर्ष: PFAS का मुद्दा केवल पानी की सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह औद्योगिक उत्पादन, उपभोक्ता उत्पादों और पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा है। साफ पानी सुनिश्चित करने के लिए प्रदूषण की रोकथाम, वैज्ञानिक निगरानी और प्रभावी शोधन व्यवस्था पर एक साथ काम करना होगा।


