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Saudi-Houthi Conflict सऊदी-हूती संघर्ष में बढ़े मिसाइल हमले, ईरान की भूमिका पर सवाल

सऊदी अरब पर हूतियों के हमले तेज, ईरान की भूमिका से बढ़ा तनाव; शांति की राह मुश्किल

यमन से सऊदी अरब तक मिसाइल और ड्रोन हमलों ने बढ़ाई चिंता, तेल ठिकानों और हवाई अड्डों की सुरक्षा पर सवाल

सऊदी अरब और हूतियों के बीच क्यों भड़की जंग?

मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने एक बार फिर गंभीर रूप ले लिया है। यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब के महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। रॉयटर्स की 15 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, हूतियों के हमलों में रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और सऊदी अरामको से जुड़े प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। इन घटनाओं ने सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

इस संघर्ष की जड़ें यमन के लंबे गृहयुद्ध में हैं। हूतियों ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद मार्च 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप किया। वर्षों तक चले संघर्ष के बाद 2022 में युद्धविराम से कुछ राहत मिली, लेकिन स्थायी राजनीतिक समझौता नहीं हो पाया। अब नए हमलों ने हालात फिर बिगाड़ दिए हैं। <Cite refs=

ईरान का क्या है कनेक्शन?

इस पूरे घटनाक्रम में ईरान की भूमिका अहम है। सऊदी अरब का आरोप है कि तेहरान हूतियों को हथियार, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देकर उनकी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान और हूती सऊदी अरब के आर्थिक तथा रणनीतिक हितों पर दबाव डालकर अपनी मांगें मनवाने की कोशिश कर सकते हैं। हालांकि, हूती नेतृत्व का कहना है कि उसके फैसले अपनी राजनीतिक और मानवीय मांगों के आधार पर लिए जाते हैं, न कि केवल ईरान के निर्देश पर।

हूतियों और ईरान के संबंधों को समझने के लिए यह भी जरूरी है कि दोनों के हित कई मुद्दों पर एक-दूसरे से मेल खाते हैं, लेकिन हूती आंदोलन की अपनी घरेलू राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी हैं। इसलिए इस संघर्ष को केवल ईरान और सऊदी अरब की सीधी लड़ाई मानना पूरी तस्वीर नहीं होगी।

शांति की कोशिशों के सामने क्या हैं चुनौतियां?

तनाव कम करने की राह में सबसे बड़ी बाधा आपसी अविश्वास और परस्पर विरोधी मांगें हैं। हूती यमन के बंदरगाहों और हवाई अड्डों पर प्रतिबंधों में राहत, सरकारी कर्मचारियों के वेतन और सऊदी सैन्य कार्रवाई समाप्त करने जैसी मांगें उठा रहे हैं। दूसरी ओर, सऊदी अरब अपनी सीमाओं, तेल प्रतिष्ठानों और नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच समझौता आसान नहीं है।

तेल और वैश्विक व्यापार पर भी असर

सऊदी अरब दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में शामिल है। उसके ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले होने से तेल आपूर्ति, बाजारों और निवेशकों के भरोसे पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी भी प्रभावित हो सकती है। इससे माल ढुलाई की लागत बढ़ने और वैश्विक व्यापार में व्यवधान का खतरा पैदा होता है।

आगे क्या होगा?

आने वाले दिनों में स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि सऊदी अरब और हूती नेतृत्व सैन्य कार्रवाई को सीमित करने तथा राजनीतिक बातचीत का रास्ता अपनाने के लिए तैयार होते हैं या नहीं। ईरान का प्रभाव इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण रह सकता है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए यमन के अंदरूनी राजनीतिक विवादों को सुलझाना भी जरूरी होगा।

फिलहाल, बढ़ते मिसाइल हमले और कमजोर पड़ते शांति प्रयास मध्य पूर्व के लिए नई चुनौती बने हुए हैं। यदि तनाव पर काबू नहीं पाया गया, तो इसका असर यमन और सऊदी अरब से आगे बढ़कर पूरे क्षेत्र की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है।

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