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Farmers Protest Roadwork : सिद्धार्थनगर में सड़क चौड़ीकरण से किसानों की बढ़ी परेशानी

सिद्धार्थनगर जनपद में विकास की गाड़ी तेज़ रफ्तार से दौड़ रही है, लेकिन इस विकास की चमक के बीच कुछ किसान अपने खेतों और फसलों के नुकसान से परेशान हैं। जिले के कपिलवस्तु विधानसभा क्षेत्र में चल रहे सड़क चौड़ीकरण कार्य ने किसानों की आंखों में आंसू ला दिए हैं। महादेवा पटनी जंगल मार्ग पर लगभग 7 किलोमीटर लंबी सड़क चौड़ीकरण परियोजना का काम इन दिनों जोरों पर है, पर यह परियोजना कुछ किसानों के लिए दर्द का सबब बन गई है।


विकास की सौगात, लेकिन किसानों के लिए चिंता का कारण

सरकार द्वारा ग्रामीण इलाकों में सड़क चौड़ीकरण को विकास की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। कपिलवस्तु क्षेत्र में भी इस परियोजना को लोगों की सुविधा और परिवहन सुधार के लिए शुरू किया गया। परंतु किसानों का कहना है कि इस विकास के बीच उनके खेतों का नुकसान हो रहा है।

कई किसानों ने आरोप लगाया है कि सड़क चौड़ीकरण में बिना उनकी सहमति के खेतों से मिट्टी निकाली जा रही है, जिससे उनकी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। इस समय गेहूं की फसल अपने सर्वोत्तम चरण में है, ऐसे में खेतों में जेसीबी और पोकलेन मशीनों के पहिए चलने से फसलें बर्बाद हो रही हैं।


किसानों की पीड़ा: “हमारा खून-पसीना बर्बाद हो गया”

महादेवा पटनी जंगल मार्ग के पास रहने वाले किसान रामसूरत ने बताया,

“हमारे खेतों में गेहूं की फसल लहलहा रही थी। लेकिन ठेकेदारों ने बिना पूछे हमारी जमीन से मिट्टी निकाल ली। खेतों में गड्ढे बन गए हैं और फसलें बर्बाद हो गईं।”

एक अन्य किसान, विजय बहादुर, ने कहा,

“हम विरोध करते हैं तो हमें धमका दिया जाता है कि सड़क सरकार की परियोजना है, रुकावट डालोगे तो कार्रवाई होगी। आखिर हमारी जमीन और फसल की भरपाई कौन करेगा?”

किसानों का कहना है कि अगर मिट्टी निकालनी ही थी, तो पहले नोटिस या सहमति ली जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया।


जेसीबी और पोकलेन मशीनों से फसलों का नुकसान

स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि सड़क चौड़ीकरण के दौरान मिट्टी कटान का काम बड़े पैमाने पर मशीनों से किया जा रहा है। इन मशीनों के टायरों और बाल्टियों से फसलें कुचली जा रही हैं। खेतों में जहां मिट्टी निकाली गई, वहां गहरे गड्ढे बन गए हैं, जिससे भविष्य में खेती करना भी मुश्किल होगा।

किसानों को चिंता है कि आने वाले मौसम में यह गड्ढे पानी भराव का कारण बनेंगे और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति भी घटेगी।


अधिशासी अभियंता का बयान

प्रांतीय खंड के अधिशासी अभियंता ने इस मामले पर कहा,

“विभाग की ओर से स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि किसी भी फसल युक्त खेत से मिट्टी नहीं निकाली जाएगी। यदि कहीं ऐसा हुआ है, तो यह ठेकेदार की गलती है। दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।”

अधिशासी अभियंता ने माना कि कुछ स्थानों पर काम की निगरानी में कमी रह सकती है, लेकिन विभाग इसका संज्ञान ले रहा है और टीमों को जांच के लिए भेजा जा रहा है।


ठेकेदारों पर नहीं है अंकुश

स्थानीय लोगों का कहना है कि ठेकेदार मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं। विभागीय अधिकारी अक्सर साइट पर मौजूद नहीं रहते, जिससे ठेकेदारों को खुली छूट मिल गई है। ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार समय से पहले काम पूरा करने के दबाव में नियमों की अनदेखी कर रहे हैं।

किसानों ने बताया कि मिट्टी कटान के दौरान मुआवजे या किसी प्रकार की भरपाई का कोई इंतजाम नहीं किया गया।


ग्रामीणों का आक्रोश, प्रशासन मौन

कपिलवस्तु विधानसभा क्षेत्र के कई गांवों में किसान इस मुद्दे को लेकर आक्रोशित हैं। कुछ किसानों ने पंचायत स्तर पर शिकायतें दर्ज कराईं, तो कुछ ने ब्लॉक मुख्यालय का रुख किया। लेकिन अब तक प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

स्थानीय निवासी शंकर यादव ने कहा,

“हमने एसडीएम को भी सूचना दी थी, लेकिन कोई अधिकारी मौके पर नहीं आया। ठेकेदार अपने हिसाब से काम कर रहे हैं।”


खेतों में गड्ढे और फसल का नुकसान

जिन खेतों से मिट्टी निकाली गई, वहां अब गहराई तक गड्ढे हो गए हैं। खेतों की सतह असमान हो गई है, जिससे आगामी सीजन में बुवाई कठिन होगी।
किसानों ने यह भी बताया कि मिट्टी हटाने से जमीन की उर्वरता (fertility) पर बुरा असर पड़ेगा।

ग्राम प्रधान का कहना है कि कुछ जगहों पर फसलों का नुकसान इतना ज्यादा हुआ है कि किसान अब कर्ज में डूबने की स्थिति में पहुंच गए हैं।


कानूनी दृष्टि से मामला

राजस्व और भूमि कानून के अनुसार, किसी निजी भूमि से मिट्टी निकालने या उपयोग करने से पहले भूमि स्वामी की लिखित सहमति आवश्यक होती है।
यदि फसल लगी हो, तो उसकी हानि की भरपाई का प्रावधान भी होता है। लेकिन किसानों का कहना है कि न तो उनसे अनुमति ली गई और न ही कोई मुआवजा दिया गया।

इससे स्पष्ट है कि नियमों का उल्लंघन हुआ है, जिसकी जांच प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक है।


कपिलवस्तु क्षेत्र की परियोजनाएं और विकास की गति

कपिलवस्तु विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों कई विकास परियोजनाएं चल रही हैं — सड़क चौड़ीकरण, नालों की मरम्मत, और ग्रामीण मार्गों का सुदृढ़ीकरण इनमें प्रमुख हैं।
महादेवा पटनी जंगल से लेकर आसपास के गांवों तक 7 किलोमीटर लंबी सड़क के चौड़ीकरण से आवागमन तो बेहतर होगा, लेकिन योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी स्पष्ट दिख रही है।


जनप्रतिनिधियों की भूमिका

स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर भी सवाल उठ रहे हैं कि उन्होंने किसानों की समस्या उठाने में देरी क्यों की। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेताओं ने प्रशासन से मांग की है कि किसानों की हुई क्षति की तुरंत जांच कर मुआवजा दिया जाए।


पर्यावरण पर भी असर

सड़क निर्माण और मिट्टी कटान से सिर्फ फसलें ही नहीं, पर्यावरण पर भी असर पड़ रहा है। खेतों के किनारे की हरियाली और पेड़ों को काटने से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कार्यों से मिट्टी का कटाव बढ़ता है और जलस्तर पर दीर्घकालिक असर पड़ता है।


विशेषज्ञों की राय

लखनऊ विश्वविद्यालय के भू-विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. अंशुमान वर्मा का कहना है,

“विकास जरूरी है, लेकिन योजनाओं के क्रियान्वयन में स्थानीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखना उतना ही आवश्यक है। फसल युक्त खेतों से मिट्टी निकालना सीधा पर्यावरणीय अपराध है।”

उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को प्रत्येक विकास परियोजना से पहले पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) और सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA) अनिवार्य करना चाहिए।


किसानों की मांगें

  1. खेतों से निकाली गई मिट्टी के बदले उचित मुआवजा दिया जाए।

  2. फसलों के नुकसान का मूल्यांकन कर भरपाई हो।

  3. ठेकेदारों पर निगरानी बढ़ाई जाए।

  4. भविष्य में किसी कार्य से पहले किसानों की सहमति ली जाए।

  5. प्रशासन एक संयुक्त निरीक्षण टीम बनाकर प्रभावित क्षेत्रों का सर्वे कराए।


प्रशासन की अगली कार्रवाई

सूत्रों के मुताबिक, जिला प्रशासन ने किसानों की शिकायतों पर संज्ञान लिया है और अधिशासी अभियंता से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
यदि आरोप सही पाए गए, तो संबंधित ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई और मुआवजे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

सिद्धार्थनगर की यह घटना यह बताती है कि विकास की राह पर अगर संवेदनशीलता न हो, तो वही विकास आमजन के लिए दुख बन जाता है।
सरकार की परियोजनाएं तभी सफल मानी जाएंगी, जब वे जनता के सहयोग और सहमति से पूरी हों।

किसानों की उम्मीद अब प्रशासन से है कि उन्हें न्याय मिलेगा, और भविष्य में कोई भी विकास कार्य उनकी फसल और मेहनत को कुचलकर नहीं गुजरेगा।

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