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administration failure UP-में अवैध खनन का खेल जारी, NGT नियमों की खुली अनदेखी

उत्तर प्रदेश के जालौन जनपद में अवैध खनन का काला कारोबार रुकने का नाम नहीं ले रहा है। नियम, कानून और प्रशासनिक सख्ती के दावों के बावजूद खनन माफिया खुलेआम सरकारी आदेशों और पर्यावरणीय नियमों को चुनौती देते नजर आ रहे हैं। आरोप है कि कुरौना क्षेत्र में नदी की धारा रोककर प्रतिबंधित मशीनों से दिन-रात अवैध खनन किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि जिलाधिकारी के सख्त निर्देशों के बावजूद यह पूरा खेल लगातार जारी है, जिससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

मामला जालौन जिले के कुरौना क्षेत्र का है, जहां गाटा संख्या 317 मि, खंड संख्या 3 में बड़े पैमाने पर अवैध खनन किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यहां पोकलैंड और लिफ्टर जैसी प्रतिबंधित मशीनों का इस्तेमाल कर नदी की धारा को रोक दिया गया है और नियमों को दरकिनार करते हुए रात-दिन खनन कार्य चल रहा है।

बताया जा रहा है कि खनन शुरू होने से पहले जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय ने सभी पट्टा धारकों के साथ बैठक कर स्पष्ट निर्देश दिए थे कि किसी भी स्थिति में अवैध खनन और अवैध परिवहन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। एनओसी जारी करते समय तय शर्तों का पालन अनिवार्य बताया गया था। साथ ही National Green Tribunal के नियमों के अनुसार नदी क्षेत्र में तीन मीटर से अधिक गहराई तक खनन पर रोक और रात के समय खनन पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया था।

इसके बावजूद जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर भारी मशीनों से लगातार खनन किया जा रहा है। नदी की प्राकृतिक धारा को प्रभावित किए जाने से पर्यावरणीय संतुलन पर भी खतरा मंडराने लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि लगातार हो रहे खनन से आसपास के क्षेत्रों में जलस्तर और खेती पर भी असर पड़ सकता है।

इस पूरे मामले में राजनीतिक संरक्षण की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। खनन संचालन से जुड़े बिनोद यादव का नाम सामने आ रहा है, जिनकी पकड़ पहले समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान मजबूत बताई जाती रही। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारतीय जनता पार्टी सरकार में भी उनका प्रभाव बरकरार है? हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिम्मेदार विभागों की चुप्पी लोगों के मन में कई तरह के संदेह पैदा कर रही है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट आदेश जारी किए जा चुके हैं, तो फिर अवैध खनन आखिर किसकी शह पर जारी है? क्या अधिकारी कार्रवाई करने से बच रहे हैं या फिर खनन माफिया सिस्टम से ज्यादा ताकतवर हो चुके हैं?

फिलहाल यह मामला प्रशासन की कार्यशैली और कानून व्यवस्था दोनों पर सवाल खड़े कर रहा है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस अवैध खनन पर कब तक प्रभावी कार्रवाई करता है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले इस खेल पर लगाम लग पाती है या नहीं।

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