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Heatwave Risk : भारत के 57 प्रतिशत जिलों में भीषण गर्मी का खतरा, 76 प्रतिशत आबादी पर मंडराया संकट

भारत के 57% जिलों पर भीषण गर्मी का खतरा, 76% आबादी प्रभावित होने की आशंका; स्वास्थ्य और आजीविका पर बढ़ा संकट

नई दिल्ली: भारत में भीषण गर्मी अब केवल मौसम में होने वाला बदलाव नहीं रह गई है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, रोजगार और आम लोगों की आजीविका के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। बढ़ते तापमान के बीच देश के बड़े हिस्से में गर्मी का जोखिम लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) की 8 अक्टूबर 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कुल 734 जिलों में से 57 प्रतिशत जिले उच्च से अत्यधिक गर्मी के जोखिम का सामना कर रहे हैं। इन जिलों में देश की लगभग 76 प्रतिशत आबादी रहती है। ऐसे में गर्मी से निपटने के लिए केवल मौसम संबंधी चेतावनियां जारी करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं और जमीनी स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है।

734 जिलों में से 57 प्रतिशत पर गर्मी का गंभीर जोखिम

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भीषण गर्मी का प्रभाव देश की बड़ी आबादी तक पहुंच रहा है। तापमान में वृद्धि से लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। विशेष रूप से खुले स्थानों पर काम करने वाले मजदूरों, निर्माण श्रमिकों, रेहड़ी-पटरी कारोबारियों और लंबे समय तक धूप में रहने वाले लोगों के लिए गर्मी अधिक खतरनाक साबित हो सकती है।

इसके अलावा, रात के समय तापमान अधिक बने रहने और हवा में नमी बढ़ने से शरीर को ठंडा रखने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में लोगों को गर्मी से राहत मिलने में कठिनाई होती है और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं।

23 राज्यों और 195 जिलों में तैयार किए गए हीट एक्शन प्लान

भारत में गर्मी के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 23 राज्यों, 195 जिलों और 64 शहरों में हीट एक्शन प्लान तैयार किए गए हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य गर्मी के प्रभाव को कम करना, समय रहते लोगों को सतर्क करना और आपात परिस्थितियों में आवश्यक कदम उठाना है।

इसके साथ ही गर्मी से जुड़ी बीमारियों की निगरानी और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण पर भी काम किया गया है। हालांकि, इन प्रयासों की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि चेतावनियों के बाद अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों और स्थानीय प्रशासन की ओर से कितनी तेजी से कार्रवाई की जाती है।

लू को प्राकृतिक आपदा का दर्जा, राहत कार्यों को मिल सकता है सहारा

अगस्त 2026 में लू को अधिसूचित प्राकृतिक आपदा का दर्जा दिए जाने से गर्मी से निपटने की व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। इससे संबंधित नियमों के तहत आपदा प्रबंधन निधि के इस्तेमाल का रास्ता खुला है। यह कदम प्रभावित क्षेत्रों में राहत, तैयारी और आपातकालीन प्रबंधन को मजबूत करने में मदद कर सकता है।

हालांकि, केवल नीतिगत फैसले पर्याप्त नहीं हैं। जरूरी है कि उपलब्ध धन का इस्तेमाल जरूरतमंद इलाकों में प्रभावी ढंग से किया जाए। अस्पतालों में आवश्यक सुविधाएं, पेयजल की उपलब्धता, सार्वजनिक स्थानों पर छाया और गर्मी से बचाव के उपाय सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है।

अस्पतालों और मजदूरों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत

गर्मी से होने वाली बीमारियों का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखना और समय रहते मरीजों की पहचान करना बेहद जरूरी है। अस्पतालों को संभावित मरीजों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए तैयार रहना होगा। स्थानीय प्रशासन को भी अपने क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार योजनाएं लागू करनी होंगी।

खुले में काम करने वाले मजदूरों के लिए काम के समय में बदलाव, पर्याप्त विश्राम, पीने का पानी और छायादार स्थान उपलब्ध कराना जरूरी है। गर्मी के कारण काम करने की क्षमता प्रभावित होने से उनकी आय पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए गर्मी से सुरक्षा को केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि रोजगार और आजीविका का विषय भी माना जाना चाहिए।

भारत समेत चार देशों के सामने एक जैसी चुनौती

CEEW की रिपोर्ट भारत के साथ नेपाल, बांग्लादेश और भूटान में भी गर्मी से निपटने की तैयारियों का आकलन करती है। इन चारों देशों के सामने प्रमुख चुनौती मौसम संबंधी चेतावनियों को जमीनी स्तर पर प्रभावी सुरक्षा में बदलने की है। समय पर सूचना देना जरूरी है, लेकिन लोगों तक राहत और जरूरी सुविधाएं पहुंचाना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

क्या गर्मी से बचाव के उपाय ही पर्याप्त हैं?

भीषण गर्मी से सुरक्षा के उपाय तत्काल नुकसान को कम कर सकते हैं, लेकिन इसके साथ उन मूल कारणों पर भी विचार करना जरूरी है जो पर्यावरणीय संकट और मानवीय असुरक्षा को बढ़ाते हैं। जब विकास की प्रक्रिया में पर्यावरण, संसाधनों के संतुलित उपयोग और आम लोगों की जरूरतों की अनदेखी होती है, तो उसका असर स्वास्थ्य और आजीविका पर भी दिखाई दे सकता है।

इसलिए चुनौती केवल गर्मी आने पर उससे निपटने की नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियों में जोखिम कम करने की भी है। बेहतर शहरी नियोजन, हरित क्षेत्रों का संरक्षण, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना और श्रमिकों के हितों की रक्षा करना दीर्घकालिक समाधान का हिस्सा हो सकते हैं।

निष्कर्ष: भारत के 57 प्रतिशत जिलों में उच्च से अत्यधिक गर्मी का जोखिम और इन क्षेत्रों में लगभग 76 प्रतिशत आबादी की मौजूदगी एक गंभीर चेतावनी है। हीट एक्शन प्लान, आपदा प्रबंधन निधि और स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारी महत्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन इनका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब योजनाएं जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू हों। गर्मी से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए तत्काल सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरणीय और सामाजिक स्तर पर दीर्घकालिक उपाय अपनाना भी जरूरी है।

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