प्लास्टिक की पाइप और यूट्यूब से देखकर बनाई जाने वाली कार्बाइड गन अब बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। गाजीपुर सहित पूर्वांचल के कई जिलों से सामने आए मामलों ने स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन दोनों को चिंता में डाल दिया है। बीएचयू की एक रिपोर्ट के मुताबिक कार्बाइड गन के प्रयोग से अब तक करीब 65 बच्चों की आंखों की रोशनी प्रभावित हो चुकी है, जिनमें 30 से ज्यादा बच्चे 14 साल से कम उम्र के हैं। डॉक्टरों का कहना है कि कई मामलों में अब सर्जरी ही एकमात्र विकल्प बचा है।
दरअसल कार्बाइड गन का इस्तेमाल पहले ग्रामीण इलाकों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले जानवरों को भगाने के लिए किया जाता था। कुछ समय तक यह किसानों के लिए मददगार साबित हुई, लेकिन धीरे-धीरे यह खतरनाक खिलौने के रूप में बच्चों के हाथों में पहुंच गई।
यूट्यूब से देखकर बच्चे प्लास्टिक की दो पाइपों के सहारे कार्बाइड गन तैयार करते हैं, जिसमें कार्बाइड की गोली, पानी और लाइटर की मदद से तेज धमाका किया जाता है। यही धमाका कई बार बच्चों की आंखों की रोशनी छीन रहा है।
बीएचयू से सामने आई रिपोर्ट के अनुसार गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर समेत पूर्वांचल के कई जिलों से गंभीर रूप से घायल बच्चे इलाज के लिए पहुंचे। इनमें से कई बच्चे ऐसे थे जिनकी आंखों की स्थिति बेहद गंभीर पाई गई।
डॉक्टरों के अनुसार मुहम्मदाबाद, भांवरकोल, जमानिया, खानपुर जैसे इलाकों से भी पीड़ित सामने आए हैं। तीन तस्वीरें देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कार्बाइड गन का असर कितना भयावह है।
गाजीपुर के महर्षि विश्वामित्र स्वशासी राजकीय मेडिकल कॉलेज में दीपावली के दिन ही 10 से अधिक बच्चे कार्बाइड गन से घायल होकर पहुंचे थे। इन सभी का इलाज नेत्र सर्जन डॉक्टर स्नेहलता सिंह द्वारा किया गया।
डॉक्टर स्नेहलता सिंह ने बताया कि दीपावली के दिन वह पूजा की तैयारी कर रही थीं, लेकिन बार-बार इमरजेंसी कॉल आने पर उन्हें पूजा छोड़कर अस्पताल आना पड़ा।
उन्होंने बताया कि दिवाली और छठ पूजा के बीच करीब 10 मामले सामने आए, जिनमें 7 से 8 केस माइल्ड थे, जिनमें हाथ या चेहरे पर जलन थी। लेकिन 3 से 4 मरीज ऐसे थे जिनकी आंखों की स्थिति काफी क्रिटिकल थी।
इन गंभीर मरीजों को हायर सेंटर रेफर किया गया क्योंकि उन्हें कॉर्निया ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती थी।
डॉ. स्नेहलता सिंह, आई सर्जन, महर्षि विश्वामित्र स्वशासी राजकीय मेडिकल कॉलेज, गाजीपुर
“कार्बाइड गन से होने वाली चोट थर्मो-केमिकल इंजरी होती है। इसमें गर्मी और केमिकल दोनों का असर आंखों पर पड़ता है। कई मामलों में कॉर्निया फट गया था, कहीं खून जम गया था, तो कहीं गंभीर ट्रॉमा हुआ था। ऐसे मरीजों में सर्जरी ही अंतिम विकल्प बचता है।”
घायल बच्चों ने बताया कि उन्होंने यूट्यूब से देखकर कार्बाइड गन बनाई थी। शुरुआत में कई बार प्रयोग करने पर कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन कुछ मामलों में गोला आगे जाने के बजाय पीछे लौट आया, जिससे यह हादसे हुए।
डॉक्टरों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं पूरी तरह से रोकी जा सकती हैं, अगर अभिभावक सतर्क रहें और प्रशासन इस पर सख्ती से रोक लगाए।
कार्बाइड गन जो कभी किसानों के लिए मददगार थी, अब बच्चों की आंखों की रोशनी छीनने का कारण बन रही है। जरूरत है जागरूकता की, ताकि यूट्यूब से सीखे गए ऐसे खतरनाक प्रयोग किसी और मासूम की जिंदगी अंधेरे में न धकेल दें।
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