बदायूं: मानवता के दुश्मन बने अस्पताल, पिता को भीख मांगकर लेना पड़ा बेटे का शव

उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले से एक ऐसी दर्दनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना सामने आई है, जिसने मानवता पर सवाल खड़ा कर दिया है। नगरिया के रहने वाले धर्मपाल उर्फ धर्मवीर का यह किस्सा सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह हमारी सामाजिक संवेदनशीलता और स्वास्थ्य व्यवस्था की भयावह स्थिति को उजागर करता है।
धर्मपाल, नगरिया, दातागंज का निवासी, 1 दिसंबर को एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया था। दुर्घटना के बाद प्राथमिक उपचार के लिए स्थानीय सरकारी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां उसे उचित इलाज नहीं मिल सका। मजबूरी में परिजन धर्मपाल को बरेली के निजी अस्पताल ओमेगा हॉस्पिटल ले गए।
अस्पताल ने पहले ही 3 लाख रुपये इलाज के नाम पर जमा करने को कह दिया। 14 दिन तक इलाज चलने के बाद धर्मपाल की हालत गंभीर बनी रही और उसकी मृत्यु हो गई। लेकिन आश्चर्यजनक और हृदयविदारक बात यह रही कि अस्पताल ने मृतक की लाश बकाया 3 लाख 10 हजार रुपये जमा करने के बाद ही देने का आदेश दिया।
धर्मपाल के पिता, सोमनाथ बाल्मीकि, ने बताया कि उनका सबसे बड़ा दर्द यह नहीं था कि उनका बेटा हादसे में घायल हुआ या उसकी मृत्यु हो गई, बल्कि दर्द तब हुआ जब उन्हें अपने बेटे की लाश लेने के लिए भीख मांगनी पड़ी।
परिवार के पास इतनी बड़ी रकम नहीं थी। पिता ने गांव वालों और परिचितों से उधार लेकर, गांव और सड़कों पर भीख मांगकर धीरे-धीरे रकम जुटाई। उन्होंने डेढ़ लाख रुपये अपने घर गिरवी रख दिए।
अस्पताल ने अंतिम क्षण में 30 हजार रुपये और मांग लिए, जिससे पिता की थकान और हताशा चरम पर पहुँच गई। अंततः मजबूर पिता को पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद ही बेटे की लाश मिली और उसका अंतिम संस्कार गांव में संपन्न हुआ।
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सोमनाथ बाल्मीकि (पीड़ित पिता): “बेटे की मौत का दर्द तो सहा जा सकता है, लेकिन उसका शव पाने के लिए भीख मांगना हमारे लिए असहनीय था। यह समाज और इंसानियत के लिए कलंक है।”
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आरती (मृतक की पत्नी): “मेरे पति की मौत ही काफी दुख है, लेकिन अस्पताल का यह बर्ताव हमारी दुनिया को अंधकार में डाल दिया। हम इंसानियत की उम्मीद खो बैठे हैं।”
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प्रेमपाल (ग्रामीण): “यह घटना दिखाती है कि आज इंसानियत सिर्फ किताबों और सोशल मीडिया में रह गई है।”
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असगर अली (ग्रामीण): “सोचने की बात है कि अस्पताल जैसे संस्थान जहां जीवन बचाने का काम होना चाहिए, वहां भी इंसानियत नहीं बची।”
इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि हमारी सामाजिक और स्वास्थ्य व्यवस्था किस दिशा में जा रही है। क्या मानवता अब सिर्फ कागजों और सोशल मीडिया पोस्ट में ही जिंदा है? क्या चिकित्सा संस्थान केवल व्यापार का माध्यम बन गए हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य केवल धन कमाना नहीं, बल्कि मरीज और परिवार की सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करना होना चाहिए। ऐसे मामलों में सरकार और प्रशासन को कड़े नियम बनाकर निजी अस्पतालों की जवाबदेही तय करनी चाहिए।
घटना के बाद स्थानीय प्रशासन ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की है। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने अस्पताल प्रबंधन को नोटिस जारी किया है और जल्द ही इस मामले में कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
धर्मपाल की यह घटना केवल बदायूं का मामला नहीं है, बल्कि पूरे देश के स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता की चेतावनी है। पिता की मजबूरी और परिवार की व्यथा समाज के हर इंसान को झकझोरती है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि मनुष्य की जिंदगी और उसकी मर्यादा धन से ऊपर है।
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