
भारत में जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमी घटनाओं का खतरा लगातार गंभीर होता जा रहा है। बाढ़, भीषण गर्मी, भारी बारिश और अन्य मौसमी आपदाएं न केवल लोगों की जान ले रही हैं, बल्कि खेती, आवास और शहरी बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचा रही हैं। Down To Earth की 12 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की रिपोर्ट में वर्ष 2025 के दौरान चरम मौसमी घटनाओं से करीब 2,760 मौतें दर्ज की गईं। वहीं, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) और Down To Earth के अलग विश्लेषण में नुकसान का दायरा इससे भी व्यापक सामने आया है।
साल के 334 दिनों में 331 दिन चरम मौसम का असर
CSE-Down To Earth के विश्लेषण के मुताबिक, वर्ष 2025 के 334 दिनों के आकलन में से 331 दिनों में देश के किसी न किसी हिस्से में चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गईं। इस दौरान कम से कम 4,419 लोगों की मौत हुई। इसके अलावा करीब 1.74 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि प्रभावित हुई, जबकि 1,81,459 मकानों को नुकसान पहुंचा।
ये आंकड़े बताते हैं कि मौसमी आपदाओं का प्रभाव केवल किसी एक क्षेत्र या मौसम तक सीमित नहीं रह गया है। इसका सीधा असर किसानों की आजीविका, ग्रामीण परिवारों के घरों और देश की खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। फसलों को नुकसान होने से किसानों की आय प्रभावित होती है, जबकि मकानों के क्षतिग्रस्त होने से प्रभावित परिवारों के सामने पुनर्वास और आर्थिक सुरक्षा की चुनौती खड़ी हो जाती है।
2050 तक शहरों पर बढ़ेगा दबाव, गर्म रातें बढ़ा रहीं चिंता
भारत में शहरीकरण की तेज रफ्तार जलवायु संबंधी चुनौतियों को और गंभीर बना सकती है। विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2050 तक भारत की शहरी आबादी लगभग 95.1 करोड़ तक पहुंच सकती है। इतनी बड़ी आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए सड़कों, आवासों, जल निकासी, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं का बड़े पैमाने पर विस्तार करना होगा। अनुमान के मुताबिक, भविष्य में आवश्यक शहरी बुनियादी ढांचे का आधे से अधिक हिस्सा अभी तैयार किया जाना बाकी है।
इसी बीच, शहरों में बढ़ता तापमान भी चिंता का विषय है। चेन्नई, सूरत और लखनऊ जैसे शहरों में रात का तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज होने की बात सामने आई है। यह स्थिति शहरी गर्मी यानी अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव की ओर संकेत करती है, जिसमें कंक्रीट की इमारतें, पक्की सड़कें और सीमित हरित क्षेत्र गर्मी को लंबे समय तक बनाए रखते हैं।
रात में तापमान अधिक रहने से शरीर को दिनभर की गर्मी से उबरने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। इसका असर स्वास्थ्य, नींद और बिजली की मांग पर पड़ सकता है। ऐसे में शहरों की योजना बनाते समय हरित क्षेत्र, जल निकायों, छायादार स्थानों और बेहतर वेंटिलेशन को प्राथमिकता देना जरूरी होगा।
आपदा अलर्ट और राहत कोष मजबूत, लेकिन चुनौतियां बरकरार
आपदाओं से निपटने के लिए भारत में चेतावनी और वित्तीय व्यवस्था को भी मजबूत किया जा रहा है। SACHET अलर्ट सिस्टम अब सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सक्रिय है। इस प्रणाली के माध्यम से 19 से अधिक भाषाओं में 134 अरब से ज्यादा एसएमएस भेजे जा चुके हैं। इसका उद्देश्य लोगों तक समय रहते आपदा संबंधी चेतावनी पहुंचाना और संभावित नुकसान को कम करना है।
इसके अलावा, 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के तहत 2026-31 की अवधि के लिए आपदा शमन कोष में 40,880 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया है। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष के 79,406 करोड़ रुपये में से 25 प्रतिशत तक राशि शमन कार्यों के लिए निर्धारित किए जाने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।
हालांकि, चेतावनी प्रणाली और वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता तभी प्रभावी साबित होगी, जब उनका इस्तेमाल जोखिम कम करने वाले ठोस कदमों में किया जाए। समय पर अलर्ट मिलने के बावजूद यदि संवेदनशील इलाकों में निर्माण जारी रहता है या कमजोर ढलानों पर अनियंत्रित कटाई होती है, तो आपदाओं से होने वाले नुकसान को पूरी तरह रोकना मुश्किल होगा।
सबसे बड़ा सवाल: चेतावनी के बाद भी क्यों नहीं बदलते फैसले?
भारत के सामने चुनौती केवल मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगाने या लोगों तक अलर्ट पहुंचाने की नहीं है। असली सवाल यह है कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर विकास और निर्माण से जुड़े फैसले कितनी तेजी से बदले जा रहे हैं।
बाढ़ संभावित क्षेत्रों में निर्माण, जल निकासी की अनदेखी, पहाड़ी ढलानों पर असंतुलित विकास और शहरों में हरित क्षेत्रों की कमी जैसे मुद्दे आपदाओं के प्रभाव को बढ़ा सकते हैं। कई बार तात्कालिक आर्थिक लाभ और निर्माण की जरूरतें दीर्घकालिक पर्यावरणीय सुरक्षा पर भारी पड़ जाती हैं।
इसलिए जलवायु जोखिम से निपटने के लिए केवल बेहतर डेटा, आधुनिक तकनीक और अधिक बजट पर्याप्त नहीं हैं। जरूरी है कि नगर नियोजन, कृषि नीति, भवन निर्माण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े फैसलों में जोखिम संबंधी जानकारी को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।

निष्कर्ष: भारत में चरम मौसमी घटनाओं से निपटने की तैयारी का अगला चरण चेतावनी देने से आगे बढ़कर नुकसान की जड़ में मौजूद कारणों को दूर करना होना चाहिए। जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्माण पर नियंत्रण, मजबूत जल निकासी, बेहतर शहरी नियोजन, सुरक्षित कृषि व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी। आखिरकार, खतरे को पहचानना पहला कदम है; वास्तविक बदलाव तभी आएगा, जब उस जानकारी के आधार पर समय रहते फैसले भी बदले जाएंगे।




