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Illegal Teak Tree Felling : वृक्षारोपण अभियान के बीच राजपुर में 40 सागौन पेड़ों की अवैध कटाई से हड़कंप

कानपुर देहात। जहां एक ओर उत्तर प्रदेश सरकार प्रदेशभर में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाकर हरियाली बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही है, वहीं दूसरी ओर कानपुर देहात के राजपुर कस्बे से सामने आई एक घटना ने इन प्रयासों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। राजपुर क्षेत्र में एक महाविद्यालय के पीछे स्थित भूमि पर खड़े करीब 40 सागौन (टीक) के हरे-भरे पेड़ों को रातों-रात काट दिए जाने का मामला प्रकाश में आया है। घटना के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिसके बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश व्याप्त है।

रात के अंधेरे में पेड़ों पर चला आरा

स्थानीय लोगों के अनुसार, महाविद्यालय परिसर के पीछे स्थित खाली भूमि पर वर्षों से सागौन के पेड़ खड़े थे। ये पेड़ न केवल पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण थे, बल्कि क्षेत्र की हरियाली और प्राकृतिक संतुलन का भी आधार थे। आरोप है कि बीती रात अज्ञात लोगों ने सुनियोजित तरीके से इन पेड़ों को काट डाला। सुबह जब ग्रामीण और छात्र वहां पहुंचे तो जमीन पर कटे हुए तनों और बिखरी टहनियों को देखकर स्तब्ध रह गए।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई बिना किसी भारी उपकरण और वाहन के संभव नहीं है। इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि इस पूरे मामले में संगठित तरीके से काम किया गया है। कई लोगों ने यह भी दावा किया कि रात में कुछ संदिग्ध वाहन इलाके में देखे गए थे, जिनमें लकड़ी लादकर ले जाई जा रही थी।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए फोटो-वीडियो

घटना के तुरंत बाद स्थानीय युवाओं ने कटे हुए पेड़ों के फोटो और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा किए। देखते ही देखते यह मामला चर्चा का विषय बन गया। पर्यावरण प्रेमियों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। लोगों ने सवाल उठाया कि जब सरकार स्वयं वृक्षारोपण को लेकर बड़े अभियान चला रही है, तब उसी प्रदेश में हरे पेड़ों की अवैध कटाई कैसे हो रही है?

कई सोशल मीडिया पोस्ट में यह भी लिखा गया कि एक ओर लाखों पौधे लगाने की घोषणाएं की जाती हैं, दूसरी ओर पहले से खड़े पेड़ों को बचाने में प्रशासन विफल साबित हो रहा है। लोगों ने दोषियों की शीघ्र पहचान और कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

वन विभाग पर उठे मिलीभगत के आरोप

घटना के बाद सबसे अधिक सवाल वन विभाग की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि बिना विभागीय जानकारी या अनुमति के इतनी बड़ी संख्या में सागौन जैसे मूल्यवान पेड़ों की कटाई संभव नहीं है। सागौन की लकड़ी बाजार में काफी महंगी मानी जाती है और इसका अवैध व्यापार लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रों में चिंता का विषय रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि यदि वन विभाग की निगरानी सख्त होती तो इस तरह की घटना नहीं होती। कुछ लोगों ने तो सीधे-सीधे विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की संभावित मिलीभगत की आशंका भी जताई है। हालांकि इन आरोपों की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जनता के मन में अविश्वास की भावना स्पष्ट दिखाई दे रही है।

रेंजर का बयान: जांच के बाद होगी कार्रवाई

मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए भोगनीपुर रेंज के रेंजर स्वामीदीन ने कहा कि सूचना मिलते ही विभागीय टीम को मौके पर भेज दिया गया है। उन्होंने बताया कि पूरे प्रकरण की जांच की जा रही है और यह पता लगाया जा रहा है कि पेड़ों की कटाई किन परिस्थितियों में हुई। यदि जांच में कोई व्यक्ति या अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

रेंजर ने यह भी कहा कि विभाग अवैध कटाई के मामलों को गंभीरता से लेता है और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया जाएगा। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल बयान देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीन पर सख्त कार्रवाई दिखनी चाहिए।

वृक्षारोपण अभियान के बीच विरोधाभास

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब प्रदेश सरकार बड़े स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चला रही है। हर वर्ष करोड़ों पौधे लगाने के लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं और अधिकारियों को इसकी निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर सरकारी स्तर पर कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें जनप्रतिनिधि और अधिकारी भाग लेते हैं।

ऐसे में, यदि पहले से खड़े हरे-भरे पेड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा पा रही है, तो वृक्षारोपण अभियानों की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौजूदा पेड़ों की रक्षा करना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। एक परिपक्व सागौन का पेड़ वर्षों में तैयार होता है और उसका पर्यावरणीय योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

पर्यावरणीय और आर्थिक नुकसान

सागौन के पेड़ अपनी मजबूत लकड़ी और दीर्घायु के लिए प्रसिद्ध होते हैं। इन पेड़ों की कटाई से न केवल पर्यावरणीय क्षति होती है, बल्कि आर्थिक नुकसान भी होता है। अनुमान लगाया जा रहा है कि 40 परिपक्व सागौन पेड़ों की बाजार कीमत लाखों रुपये में हो सकती है। यदि यह कटाई अवैध रूप से की गई है, तो यह न केवल वन संपदा की चोरी है बल्कि सरकारी संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाने का मामला बन सकता है।

पर्यावरण की दृष्टि से देखें तो पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से क्षेत्र का तापमान बढ़ने, जैव विविधता पर असर पड़ने और वायु गुणवत्ता में गिरावट जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। स्थानीय स्तर पर छाया, ऑक्सीजन और प्राकृतिक संतुलन में भी कमी आती है।

प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की मांग

घटना के बाद स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए। दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति या गिरोह इस तरह की हरकत करने की हिम्मत न कर सके। साथ ही, क्षेत्र में वन विभाग की गश्त बढ़ाने और संवेदनशील स्थानों पर निगरानी कैमरे लगाने की भी मांग की गई है।

कुछ सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि समयबद्ध कार्रवाई नहीं हुई तो वे प्रदर्शन करने को बाध्य होंगे। उनका कहना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी नारे तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे जमीनी स्तर पर सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

आगे की राह

कानपुर देहात के राजपुर में हुई यह घटना केवल एक स्थानीय मामला नहीं है, बल्कि यह व्यापक स्तर पर वन संरक्षण व्यवस्था की स्थिति को दर्शाती है। जब सरकार हरित उत्तर प्रदेश का सपना दिखा रही है, तब ऐसे मामलों का सामने आना चिंताजनक है। आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन, वन विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर वन संपदा की सुरक्षा सुनिश्चित करें।

अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर टिकी है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और क्या वास्तव में दोषियों पर कठोर कार्रवाई होती है या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाता है। फिलहाल, राजपुर के लोगों में आक्रोश है और वे न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

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