कोंच-जालौन के नदीगांव ब्लॉक से शिक्षा व्यवस्था को शर्मसार कर देने वाली एक बेहद गंभीर और चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। नदीगांव ब्लॉक के ककरोली खोडन गांव स्थित सरकारी प्राथमिक विद्यालय से ऐसे आरोप सामने आए हैं, जिन्होंने सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा, पोषण और शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
इस स्कूल में पढ़ने वाले मासूम बच्चों ने स्कूल की रसोइया और शिक्षकों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। बच्चों का कहना है कि मिड-डे मील मांगने पर उन्हें डांटा जाता है और कई बार मारपीट तक की जाती है। यही नहीं, कई दिनों तक स्कूल ही नहीं खोला जाता, जिससे बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित हो रही है।
बच्चों के इन खुलासों के बाद अभिभावकों में भारी आक्रोश है और उन्होंने प्रशासन से तत्काल जांच और सख्त कार्रवाई की मांग की है।
नदीगांव ब्लॉक के ककरोली खोडन गांव के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों ने जो बातें बताईं, वे बेहद चौंकाने वाली हैं। बच्चों के अनुसार स्कूल में मिड-डे मील की व्यवस्था पूरी तरह लचर है। कई बार भोजन अधूरा मिलता है, तो कई बार खाना बनाया ही नहीं जाता। मजबूरी में बच्चों को भूखे पेट घर लौटना पड़ता है।
बच्चों ने यह भी आरोप लगाया कि जब वे खाना मांगते हैं तो रसोइया द्वारा उन्हें डांटा और मारा जाता है, जिससे वे डरे-सहमे रहते हैं।
इतना ही नहीं, बच्चों का कहना है कि शिक्षक कई-कई दिनों तक स्कूल नहीं आते। स्कूल बंद रहता है और पढ़ाई पूरी तरह ठप हो चुकी है। शिक्षा के अधिकार कानून के तहत जहां बच्चों को नियमित पढ़ाई और सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए, वहां उन्हें डर और भूख में दिन गुजारने पड़ रहे हैं।
मामले की जानकारी मिलते ही गांव के अभिभावकों में जबरदस्त आक्रोश देखने को मिला। अभिभावकों का कहना है कि उन्होंने अपने बच्चों को शिक्षा और बेहतर भविष्य के लिए स्कूल भेजा था, लेकिन वहां उनके साथ मारपीट और लापरवाही की जा रही है।
अभिभावकों ने आरोप लगाया कि स्कूल प्रशासन और शिक्षा विभाग की लापरवाही के चलते यह स्थिति बनी है। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी रसोइया और शिक्षकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
गांववासियों का कहना है कि यह कोई पहली बार नहीं है। इससे पहले भी कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यही वजह है कि जिम्मेदारों के हौसले इतने बुलंद हो गए कि अब मासूम बच्चों के साथ भी अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले मासूम बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और पोषण सिर्फ फाइलों और कागजों तक ही सीमित रह जाएगी?
क्या जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर मामले में जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करेंगे, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
फिलहाल पूरे क्षेत्र की नजरें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।
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