March 27, 2017 10:18 AM
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हो सकता है अखिलेश ऐसे ही हों, पर ये घटनाएं कुछ और ही इशारा करती हैं

हिंद न्यूज डेस्क। उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार के पांच साल लगभग पूरे ही हो गए हैं. सत्ता सुख पूरे होने के आखिरी लम्हों में प्रदेश के मुख्यमंत्री की छवि ऐसी बन कर उभरी है, कि समाजवादी पार्टी में अकेले वो ही ऐसे एकमात्र नेता बचे हैं, जिन्हें दागियों से भ्रष्टाचारियों से खनन माफियाओं से गुंडागर्दी करने वालों से सख्त नफरत है.

इसके साथ ही पार्टी में वो ही एकमात्र ऐसे नेता बचे हैं, जो जनता के हित में लिए गए निर्णयों को लेकर अडिग हैं, जबकि सरकार के कार्यकाल के दौरान कई ऐसी घटनाएं हुईं जिनमें उन्हें एक मजबूत शासक की तरह खड़े होकर त्वरित एक्शन लेने चाहिए थे और साबित करना चाहिए था, कि असल में वो गुंडागर्दी करने वालों से खनन माफियाओं से और दागियों से वाकई सूबे की जनता को बचाना चाहते हैं और इनके खिलाफ सख्त कदम उठाने को तत्पर रहते हैं.

पर उनकी जो भी मजबूरियां रही हों वो तब वैसे नजर नहीं आए. यहां हम जिक्र करेंगे कुछ ऐसी घटनाओं का जो उनकी कतर्व्य परायणता पर उंगली उठाती हैं.

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इन घटनाओं से झलकती है उनकी लाचारी

अखिलेश यादव के शासनकाल में हुई ये कुछ ऐसी घटनाएं हैं, जो चीख चीख कर उनकी लाचारी को उजागर करती हैं. शुरुआत करते हैं मुजफ्फर नगर के दंगों से. इस दंगे में साठ के आसपाल लोगों की मौत हुई थी. इसके अलावा भारी मात्रा में जानमाल का नुकसान हुआ था.

इस सब के बीच वहां पर दंगे में विस्थापित हुए पिरवारों के सामने रहने खाने का संकट था तो वहीं दूसरी ओर सीएम अखिलेश यादव सैफई में फिल्मी सितारों के ठुमकों का लुत्फ उठा रहे थे. हद तो तब हो गई जब टेंट में रह रहे दंगा पीड़ितों के टेंट उखड़वा दिए गए ये बोल कर कि इससे छवि खराब होती है.

ऐसे में यूपी के सीएम रहते हुए अखिलेश को कुछ ऐसा करना चाहिए था जो दंगा पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाता और साबित करता कि वाकई सीएम वैसे हैं जैसे इस वक्त दिख रहे हैं.

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दादरी कांड पर भी बेबस से ही नजर आए

दादरी में जब कुछ धर्म के ठेकेदार लोगों ने अखलाक को घर से खींच करा मार डाला, तो सरकार का रवैया ऐसा रहा जैसे इस पूरे घटनाक्रम से सरकार को कोई लेना देना ही नहीं है, जबकि किसी भी सूबे में ऐसी शर्मनाक घटना होने पर सरकार इस तरह से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती.

प्रदेश सराकर के रवैया से लगा जैसे जो कुछ हुआ उसका सारा श्रेय एक दूसरे दल के लोगों को जाता है. वो तो उन सब के आगे बेबस हैं, जबकि सूबे में कानून व्यवस्था की जिम्म्दारी तो वहीं राज कर रही सरकार की ही होती है.

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पत्रकार को जिंदा जलाया गया, मंत्री का नाम लिया, पर क्या हुआ मंत्री जी का

शाहजहांपुर में एक पत्रकार को जिंदा जला दिया गया. मरते हुए उस पत्रकार में घटना का जिम्मेदार सपा के एक मंत्री को बताया, लेकिन उन मंत्री जी का बाल भी बांका न हुआ. इतना ही नहीं ये मामला तो पता नहीं कहां गायब हो गया. मरते वक्ते पत्रकार जगेंद्र ने अपने बयान में कहा था कि मंत्री राममूर्ति वर्मा की शह पर पुलिस ने उसे जलाया था.

राममूर्ति स्टेट बैकवर्ड क्लासेज मिनिस्टर थे. इस मामले की गवाह थी एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता. और विडंबना ये है कि उसी औरत ने मूर्ति और उनके लोगों पर रेप का इल्जाम लगाया था. जगेंद्र ने इसी औरत के लिए लड़ाई लड़ी थी. उस औरत ने ये भी कहा था कि मूर्ति के लोगों ने जगेंद्र के साथ उसे भी जलाने का प्रयास किया था. पर वह भाग निकली. आज ये घटना लोगों को याद भी नहीं होगी.

इतना ही नहीं ये घटना नेशनल मीडिया की सुर्खियां भी बनी थी. ये वाकई एक शर्मनाक घटना थी और उससे भी शर्मनाक ये है कि इसमें जिस तरह की कार्रवाई होनी चाहिए थी, वैसी हो नहीं पाई, क्या ये मामला सीएम के संज्ञान में नहीं आया होगा, तो उन्होंने इस पूरे मामले पर क्या ठोस कदम उठाए ये भी सोचनीय है.

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खनन माफिया पर कार्रवाई में सस्पेंड की गईं दुर्गा शक्ति नागपाल

एक तरफ तो सीएम अखिलेश यादव माफिया गुंडों और दागियों के खिलाफ खड़े दिखते नजर आ रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर खनन माफियाओं पर शिकंजा कसने में गौतमबुद्ध नगर की डीएम दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबन की सजा झेलनी पड़ी. उस समय निलंबन की कार्रवाई भी तो सीएम ने ही की होगी. ऐसी और भी कई घटनाएं हैं जो सीएम की फिलहाल बनी छवि पर प्रश्नचिन्ह जरूर लगा रही हैं.