March 30, 2017 12:35 AM
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कुछ रोचक किस्से जिनमे बच्चो की मां जानवर बन गई

हिन्द न्यूज़ डेस्क-  (NAMRATA PATEL) ऐसे बहुत से बच्चे है, जिन्हें जंगली जानवरों ने पाला पोसा, और वो सारे बच्चे बहुत ही आराम से जीते  है, लेकिन उनमे उन्ही जानवरों की सारी एक्टिविटीस होती है, जो उनकी देख-रेख करते है,

ऐसे ही भारत में पैदा हुए ब्रिटिश कवि, लेखक और नोबेल पुरस्कार विजेता रूडयार्ड किपलिंग की वर्ष 1894 में एक कहानी संग्रह ‘द जंगल बुक’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। इस किताब पर समय-समय पर बहुत सारी फिल्में जिनका नाम भी ‘द जंगल बुक’ भी रखा गया था।

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ऐसी पहली फिल्म 1994 में पहली बार आई थी और तब से लेकर अब तक 19 एनीमेटेड फिल्में बनाई जा चुकी हैं। भारत में टीवी पर ‘जंगल बुक’ नाम से एनीमेटेड फिल्म बनाई गई। हाल ही वाल्ट डिज्नी ने 19वीं एनीमेटेड फिल्म बनाकर दुनिया भर में प्रदर्शित की है। इस फिल्म के प्रदर्शन से पहले भारत में बनी टीवी एनीमे‍टेड फिल्म जंगल बुक खाफी चर्चित और लोकप्रिय रही जिसमें ‘मोगली’ नाम के एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो कि भेड़ियों के द्वारा पाला जाता है और बाद में इसे सारी दुनिया के सामने लाया जाता है। किपलिंग ने जिस भेड़िया बच्चे मोगली की कहानी कही है, वह एक अरसा पहले के मध्यप्रदेश के कस्बे सिवनी की है, जहां के जंगलों में मोगली मिला था।

तब से लेकर भारत में ऐसे कई बच्चों की कहानियां सामने आईं जो कि जंगलों में पले-बढ़े और समझा जाता है कि उन्हें जानवरों ने पाला या फिर वे जानवरों के सम्पर्क में रहते हुए दुनिया के सामने आए। भारत में ऐसी घटनाओं को ‘जंगली बच्चे’ (फेरल चिल्ड्रन) नामक अपने प्रोजेक्ट के लिए फोटोग्राफर जूलिया फुलरटन-बैटन ने ऐसे बच्चों की तस्वीरें ली थीं और उन्होंने इनके बारे में भी जानकारी दी थी। इन कहानियों या घटनाओं को लेकर किसी प्रकार की प्रामाणिकता का दावा नहीं किया जा सकता है, लेकिन यह कहना गलत न होगा कि इनका उल्लेख समय-समय पर बहुत सारे प्रसिद्ध समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और देशी-विदेशी मीडिया में किया गया है।

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ऐसा कहा जाता है कि ये जंगली बच्चे जानवरों के बीच न केवल पले-बढ़े और उनकी आदतें भी सीख गए थे, बल्कि उनके बीच सालों तक सुरक्षित भी रहे। इनके अलावा भी दुनिया भर में कई ऐसी घटनाओं का उल्लेख है, जिनमें बच्चों ने ‘जंगल बुक’ वाले मोगली की तरह ही जानवरों के बीच बचपन गुजारा।

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वर्ष 2014 में निर्देशक वक रज्यूमोविक की पहली फिल्म ‘नो वन्स चाइल्ड’ (‘No One’s Child’) आई थी जिसके एक सच्ची घटना पर आधारित होने का दावा किया है। वर्ष 1988 में शिकारियों के एक गुट ने इस बच्चे को बोस्निया के खतरनाक जंगलों में भेड़ियों के बीच पाया था। इस फिल्म को दुनिया भर में सराहा गया। इस फिल्म को ‘द अर्बन जंगलबुक’ (The Urban Jungle Book) कहकर भी सम्मानित किया गया था। इसी तरह वर्ष 2014 में आई मैरियाना चैपमैन (Marina Chapman) की किताब ‘The Girl With No Name’ में लेखिका ने अपने साथ घटित हुई उस घटना का वर्णन किया है।

रोमुलस और रीमस : ये बच्चे भारत में पले-बढ़े लेकिन विदेशों में भी ऐसी बहुत सी कहानियां हैं जो कि ऐसी ही मिलती जुलती हैं। कहा जाता है कि रोम में दो जुड़वां भाइयों, रोमुलस और रीमस को पाया गया था। बच्चे को अनाथ छोड़ दिया गया था और दोनों को मादा भेड़ियों ने अपना दूध पिलाया था। बाद में उन्हें एक घुमंतू चरवाहे ने देखा और उनकी देखरेख की। कहा जाता है कि इन्होंने पैलाटिन हिल पर एक बड़े शहर की नींव डाली। यह वही जगह थी जहां भेड़ियों ने उनकी देखरेख की थी। कहा जाता है कि इन्होंने पैलाटिन हिल पर एक बड़े शहर की नींव डाली। यह वही जगह थी जहां भेड़ियों ने उनकी देखरेख की थी। इसे काल्पनिक कहानी ही माना जाता है, लेकिन ऐसी बहुत सी कहानियां हैं जिनमें बच्चों के जंगलों में पाले पोसे जाने की कहानी जुड़ी हुई है.

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कुत्तों की तरह व्यवहार करने वाली लड़की के बारे में…. यूक्रेन की डॉग गर्ल : अपने माता-पिता की उपेक्षा की शिकार ओक्सना मालाया को तीन वर्ष से 8 वर्ष की आयु तक एक कुत्ताघर में रहना पड़ा था। इस समय में केवल कुत्ते ही उसके साथी और करीबी प्राणी थे। वर्ष 1991 में जब उसे पाया गया तो वह बोल नहीं पाती थी और केवल भौंक सकती थी। वह दोनों हाथों और पैरों से घूमती थी। आज वह बीस वर्ष से अधिक उम्र की है, लेकिन मालाया को बोलना सिखाने की कोशिश की गई लेकिन ज्ञान संबंधी कमियों के चलते बोल नहीं सकती है। वह एक मानसिक संस्थान में रहती है और इसके पास एक फार्म में गायें रहती हैं जिनकी वह देखभाल करके खुश रहती है।

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कंबोडिया की जंगल गर्ल : कंबोडिया में जंगल के किनारे पर भैंसें चराने वाली आठ वर्ष की रोशम पैनजीइंग जंगल में खो गई थी और रहस्यमय ढंग से गायब रहने के 18 वर्ष बाद 2007 में उसे एक किसान ने देखा। ग्रामीण ने पूरी तरह से निर्वस्त्र महिला को अपने खेत पर चावल चुराते देखा था। बाद में, उसकी पहचान रोशम पेनजीइंग के तौर पर हुई जिसकी पीठ पर घावों को देखा जा सकता था। वह तीस वर्ष की महिला हो गई थी लेकिन उसने खुद को किसी तरह से घने जंगलों में जीवित रखा। वह स्थानीय संस्कृति में ढल नहीं सकी और उसे स्थानीय भाषा भी नहीं आई तो वह मई 2010 को फिर से जंगल में भाग गई। उसके बारे में तरह-तरह की बातें कही जाती हैं।

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